शिव और कांवड़ियों की भक्ति तथा यात्रा की सच्चाई

जैसे ही श्रावण महीने का आगमन हुआ, केसरिया रंग के कपड़े पहने शिवभक्तों के जत्थे कांवड़ यात्रा के लिए निकल पड़े हैं। शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कांवड़िये नंगे पांव सैंकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं और अपने कंधे पर कमंडल में गंगाजल भरकर, शिव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।

कांवड़ यात्रा 2019‘ में भी कांवड़ियों के जत्थे उत्तर भारत में सावन का महीना प्रारम्भ होते ही सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं। श्रावण महीने की इस कांवड़ यात्रा को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, परशुराम पहले कांवड़िये थे तो कुछ ने श्रवण कुमार को त्रेतायुग का सबसे पहला कांवड़िया बताया। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार श्री रामचन्द्र जी पहले कांवड़िये थे और ऐसी मान्यता भी है कि रावण ने सर्वप्रथम इस परंपरा की शुरुआत की थी। आज भी श्रद्धालु उपरोक्त मान्यताओं के आधार पर ही इस परंपरा का पालन कर रहे हैं या यूं कहें शास्त्र और वेद विरुद्ध साधना का निर्वाह कर रहे हैं।

प्रचलित मान्यता है कि इस महीने में सारे देवता शयन कर रहे होते हैं लेकिन शिवजी सक्रिय और जागृत अवस्था में रहकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, इसीलिए सावन के इस महीने को शिव माह भी कहा जाता है परंतु सत्य तो यह है कि शिव भगवान कहे जाने के बाद भी , पौराणिक कथाओं के अनुसार अपनी ही रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध हुए हैं।

शिवजी की भक्ति करने से क्या और कितना लाभ मिलता है?

लंकापति रावण भी तमोगुणी शिव जी का अनन्य भक्त था लेकिन रावण को शिव जी से वही प्राप्त हुआ जितनी शक्ति उनमें देने की है। शिव जी की भक्ति से रावण के विकार समाप्त नहीं हुए बल्कि रावण को तमोगुण और अहंकार प्राप्त हुआ। शिव जी की भक्ति से सद्बुद्धि प्राप्त नहीं हुई जबकि इसके विपरीत रावण ने अपनी कुबुद्धि के कारण दुष्टता कर दी और अपनी ही माता समान सीता को उठाकर ले आया। अपने ही इष्ट शिव जी के बड़े भाई विष्णु जी की पत्नी अर्थात श्री राम रूप में आये हुए विष्णु जी की पत्नी सीता पर रावण ने बुरी दृष्टि डाली और अंत मे उसके पूरे कुल का नाश हुआ।

इसके विषय में कबीर साहेब जी कहते हैं:

गुण तीनों की भक्ति में भूल पड़ो संसार।
कहे कबीर निज नाम बिना, कैसे उतरे पार।।

अर्थात सभी इन तीन गुणों (रजोगुण ब्रह्मा जी, सतोगुण विष्णु जी, तमोगुण शिव जी) को ही सर्वश्रेष्ठ मानकर इनकी भक्ति कर रहे हैं जबकि वास्तविक परमात्मा तो कोई और है और उसकी भक्ति किये बिना हमारी आत्मा का उद्धार नहीं हो सकता है और ना ही हमारा मोक्ष हो सकता है।

शिव जी खुद की रक्षा नहीं कर सके, वह अपने भक्तों की रक्षा कैसे करेंगे?

पौराणिक कथाओं के अनुसार भस्मागिरि नाम का एक साधक था जिसने तमोगुण शिव जी के महल के सामने ऊपर को पैर और नीचे सिर करके बारह वर्ष तक उल्टा रहकर तपस्या की थी अर्थात शिवजी की भक्ति मन में कुटिलता रखते हुए की जिसे शिव जी भांप तक नहीं पाए थे। तपस्या पूरी होने के बाद भस्मागिरी ने शिव जी से वरदान में भस्मकंड़ा मांग लिया। उस भस्मकंड़े में शक्ति थी कि जिस किसी के सिर पर रखकर “भस्म” कह दिया जाए तो सामने वाला भस्म हो जाता था। भस्मागिरि शिव जी को मारकर माता पार्वती को अपनी पत्नी बनाना चाहता था, इसलिए भस्मागिरि शिव जी को ही भस्म करने को उनके पीछे भागा। शिव जी भस्मागिरि से बचकर भाग रहे थे लेकिन तभी विष्णु जी आये और मोहिनी रूप बनाकर भस्मागिरि को नचाया और उसे ऐसी मुद्रा में लाए जब उसका हाथ उसके स्वयं के सिर पर था तभी विष्णु जी ने कहा,”भस्म” और भस्मागिरि जल कर राख हुआ और भस्मासुर कहलाया।

केदारनाथ में हजारों शिवभक्तों की मौत से भी श्रद्धालु काल जाल को नहीं समझ पाए

5 साल पहले सन 2013 में केदारनाथ में जलप्रलय आने से एक खौफनाक मंजर देखने को मिला था। इस मंजर को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। बाढ़ के कारण जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। बहुत से लोग बाढ़ में बह गए और हजारों लोग बेघर हो गये थे। 24 जून, 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, इस भयानक आपदा में मृतकों की संख्या 50,000 बताई गई थी। विचारणीय बात यह है कि जो भक्त अपने भगवान के दर्शनार्थ जाते हैं, क्या ऐसे भक्तों के प्रति शिव जी को रत्तीभर भी दया नहीं होती? आखिर क्या वजह है कि जिन शिवजी को अविनाशी कहा जाता है, वह अपनी मूर्ति के अस्तित्व और अपने भक्तों को काल ग्रास से बचाने में असमर्थ रहे? उस स्थान पर भगवान है ही नहीं।

श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 में कहा गया है कि जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और ना ही सुख को।

गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक में कहा गया है कि जो भी तीनों गुणों से (रजगुण-ब्रह्मा से जीवों की उत्पत्ति, सतगुण-विष्णु जी से स्थिति तथा तमगुण-शिव जी से संहार) जो कुछ भी हो रहा है उसका मुख्य कारण मैं (ब्रह्म/काल) ही हूँ। (क्योंकि, काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के शरीर को मार कर मैल को खाने का श्राप लगा मिला हुआ है) जो साधक मेरी (ब्रह्म की) साधना न करके त्रिगुणमयी माया (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) की साधना करके क्षणिक लाभ प्राप्त करते हैं जिससे ज्यादा कष्ट उठाते रहते हैं, साथ में संकेत किया है कि इनसे ज्यादा लाभ मैं (ब्रह्म-काल) दे सकता हूँ, परन्तु ये मूर्ख साधक तत्वज्ञान के अभाव से इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) तक की साधना करते रहते हैं। इनकी बुद्धि इन्हीं तीनों प्रभुओं तक सीमित है। इसलिए ये राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, शास्त्र विरूद्ध साधना रूपी दुष्कर्म करने वाले, मूर्ख मुझे (ब्रह्म को) ही भजते हैं।

यदि किसी तीर्थ या धाम पर जाने से भगवान खुश होते तो केदारनाथ और नीलकंठ जैसी भयानक घटनाएं नहीं होतीं। अगर श्रद्धालु के साथ कुछ अच्छा होता भी है तो यह मनुष्य का अपने प्रारब्ध का कर्म फल ही होता है जिसे अपने इष्ट की कृपा मान लिया जाता है लेकिन पूर्ण परमात्मा के अलावा प्रारब्ध के पाप क्षमा करने की सामर्थ्य किसी अन्य देवता में नहीं है।

शिव जी स्वयं मोहरूपी जाल से नहीं बच सके तो उनके साधक कैसे बच पाएंगे?

विचार कीजिये कि जब शिव जी की पत्नी “सती” (पार्वती जी राजा दक्ष की पुत्री) पिता द्वारा तैयार हवनकुंड में जलकर मर गई थी तो शिव जी अपनी पत्नी के मोह में व्याकुल पत्नी सती की लाश को कंधे पर लादकर दस हजारों वर्षों तक भटकते रहे और सृष्टि चक्र (जीव संहार) को भी भूल गए थे। तब विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से सती की लाश के टुकड़े किये और शिव जी को उनके कार्य, जीव संहार में लगे रहने का भान कराया। ऐसे में अगर कोई शिव भक्त अपने इष्ट से मोह बन्धन (राग, मोह, काम, तमोगुण) से मुक्त होने की कामना करे तो क्या शिव जी ऐसा कर पाएंगे? नहीं।

कांवड़ यात्रा करने से पुण्य कमाई होती है या पाप कमाई?

प्राचीन समय में सावन के महीने में साधु-संत घर से बाहर नहीं निकलते थे क्योंकि उनका मानना था कि श्रावण (सावन) के महीने में बारिश का मौसम होता है और ज्यादातर जीव, जंतु मिट्टी में चिपके रहते हैं जो पाँव के नीचे दबकर मरते हैं। इसी पाप से बचने के लिए इस महीने साधु-संत अपने घर में ही भक्ति किया करते थे। लेकिन वर्तमान में काल का जाल इतना गहरा हो चुका है कि सावन का महीने शुरू होते ही काल पहले तो कांवड़ियों को प्रेरणा करता है कि तुम पैदल यात्रा करो और फिर जब कांवड़ियों के जत्थे सड़कों पर उतरकर असंख्य जीवों की हत्या कर देते हैं तो इन्हीं पापों को भक्तों के ऊपर डाल देता है और शिवभक्तों को यह भ्रम भी बना रहता है कि कांवड़ यात्रा करके हमने अपना जीवन सफल कर लिया और हम मोक्ष के बिल्कुल करीब हैं।

प्रसाद के नाम पर भांग व गांजा पीने वाले शिव भक्तों की यह बहानेबाजी उचित नहीं है

शिव भक्त कहते हैं कि शिव जी ने भांग, धतूरे और गांजे का सेवन किया था और उसी को हम प्रसाद रूप में सेवन करते है। शिवभक्तों का यह भ्रम किसी भी पवित्र शास्त्र में लिखित नहीं है। भांग और गांजे के नशे में धुत कई कांवड़ियों की यात्रा के दौरान दुर्घटना में मौत हो जाती है। नीलकंठ यात्रा के दौरान अब तक कई मौतें भी हो चुकी हैं तो ऐसे हालात में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर वह असली भगवान कहाँ है जो हर आपत्ति- विपत्ति में अपने भक्तों की रक्षा करता है?

भक्तों का भगवान ही अपने भक्तों को मूर्ख क्यों बना रहा है?

सच्चाई तो यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिवजी), इन तीनों का पिता काल (जिसे ब्रह्म व ज्योति निरंजन भी कहा जाता है) इसे एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों का नित्य आहार करने और सवा लाख जीव रोज उत्पन्न करने का श्राप लगा हुआ है। अपनी इसी भूख को मिटाने के लिए ही काल (ब्रह्म) ने मनुष्य के साथ धोखा किया तथा उसे असली परमात्मा कबीर साहेब (कविर्देव) की पूर्ण जानकारी व सतभक्ति विधि से वंचित रखा क्योंकि, यह काल नहीं चाहता कि कोई भी प्राणी पूर्ण मोक्ष प्राप्त करे, इसीलिए यह अपने तीनों पुत्रों, ब्रह्मा से जीव उत्पत्ति, विष्णु से पालन, तथा शंकर से जीव संहार करवाता है।

अगर जीवन में सुख व पूर्ण मोक्ष चाहिए तो अविनाशी परमात्मा को पूजना होगा

वेदों में प्रमाण है कि पूर्ण परमात्मा कबीर जी ही पूजा के योग्य हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी की भक्ति पूर्ण मोक्षदायक नही है। प्रमाण :- शिव महापुराण पृष्ठ सं. 24 से 26 विद्ध्वेश्वर संहिता तथा पृष्ठ 110 अध्याय 9 रूद्र संहिता ‘‘मैं- विष्णु जी दुर्गा (प्रकृति) से कहते हैं कि हे मात !
ब्रह्मा, मैं (विष्णु) तथा शिव तुम्हारे ही प्रभाव से जन्मवान हैं। हम नित्य नही हैं अर्थात् हम अविनाशी नहीं हैं, फिर अन्य इन्द्रादि दूसरे देवता किस प्रकार नित्य हो सकते हैं। तुम ही अविनाशी हो, प्रकृति तथा सनातनी देवी हो, अपने पति पुरुष अर्थात् काल भगवान के साथ सदा भोग-विलास करती रहती हो, आपकी गति कोई नहीं जानता।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पूर्ण परमात्मा कबीर जी की जानकारी नहीं थी कि कबीर जी ही वह सर्वशक्तिमान व अविनाशी परमात्मा हैं जिनकी कभी मृत्यु नहीं होती और जो हमें सर्व सुख व मोक्ष देने वाले हैं। इसलिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश अपनी माता दुर्गा को अविनाशी व नित्य मानते हैं।

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, शंकर जी जन्म मरण के चक्र में हैं तथा उनकी भक्ति से पूर्ण मोक्ष नहीं हो सकता।

ॐ नमः शिवाय” और “बम बम भोले” जपने से कोई लाभ नहीं होगा

उपरोक्त मंत्र किसी भी वेद शास्त्र में नहीं लिखे हैं, यह मनमुखी साधना है जो शास्त्र विरुद्ध है। अगर आप वास्तविक भक्ति करना चाहते हैं तो आपको सद्ग्रन्थों से प्रमाणित मंत्र जाप करना होगा।

श्रीमद भगवद गीता जी के अध्याय 17 श्लोक 23 में प्रमाण है कि परमात्मा को पाने का तीन मंत्रों (ओम तत् सत्) जाप है और इन मंत्रों से ही पूर्ण मोक्ष संभव है और वो भी पूर्ण अधिकारी संत से प्राप्त सही विधि की जाए, फिर वह तत्वदर्शी संत आपको इन सांकेतिक मंत्रों को खोलकर बताएगा।

कांवड़ियों से प्रार्थना

जरा विचार करें कि शंकर जी ज़्यादातर समाधि में लीन रहते हैं। क्या आप ने कभी सोचा है कि वह किसकी भक्ति करते हैं? सच तो यह है कि उनसे ऊपर भी कोई परम शक्ति है जिसकी भक्ति करने से ही पूर्ण मोक्ष संभव है और यह पूर्ण मोक्ष तो सिर्फ तत्वदर्शी संत की शरण में जाने से ही मिलेगा।
उपरोक्त मंत्र (ॐ तत् सत्) को संत रामपाल जी महाराज जी सही विधि से प्रदान करते हैं जो कि वर्तमान में पूरी धरती पर किसी के पास नहीं है। अधिक जानकारी के लिए अवश्य पढ़ें पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा

अतः सभी मानव समाज से हमारी प्रार्थना है कि मनुष्य जीवन बहुत अनमोल है जो हमें सतभक्ति करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्राप्त हुआ है। यदि समय रहते पूर्ण गुरु (सतगुरु) धारण करके सतभक्ति नहीं की तो अंत समय में पछताने के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा।

।।कबीर, आच्छे दिन पाछे गए, गुरु से किया ना हेत।
अब पछतावा क्या करे, जब चिड़िया चुग गई खेत।।

इसलिए बिना समय गंवाए सतगुरु रामपाल जी महाराज जी की शरण में आएं, जिससे सभी मनुष्यों का जीवन सफल होगा और सभी को मोक्ष प्राप्ति हो सके।