मकर संक्रांति सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का दिन, सूर्य के उत्तरायण होने का दिन, सूर्य के मकर रेखा पर से गुजरने का दिन है ।

और इस दिन को भारत सहित नेपाल, बांग्लादेश, कम्बोडिया, श्रीलंका आदि देशों में भिन्न भिन्न नाम और भिन्न परम्पराओं के अनुसार मनाया जाता है।
भारत देश के विभिन्न राज्यों में भी इसे भिन्न भिन्न नाम व तरीकों से मनाया जाता है।

मकर सक्रांति के पर्व में चाहे वह भिन्न भिन्न राज्य या भाषा बोलने वाले मनाते हों लेकिन इस पर्व में जो सामान्य बात नजर आती है वह यह है कि इस दिन सभी दान करने के विशेष महत्त्व को ध्यान में रखते हुए दान करने में आगे रहते हैं।
दान में धन, अन्न, वस्त्र, भोजन या कोई भी जीवनयापन के साधन रूपी वस्तु का ही प्रयोग करते हैं। लेकिन गीता अध्याय 4 में ज्ञान यज्ञ को सभी यज्ञ से श्रेष्ठ बताया गया है।

ज्ञान की प्राप्ति सच्चे गुरु के बिना नहीं हो सकती। गीता ज्ञान दाता भी कहता है कि उस ज्ञान की प्राप्ति के लिए तत्वदर्शी सन्त की खोज करो, वही तुझे तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे।

कहते हैं कि
गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल है, चाहे पूछो वेद पुराण।।

उदाहरण के लिए मान लीजिए हमने किसी को दान में पैसे दिए। वह भिखारी उन पैसे की शराब पीकर अपने बीवी बच्चों को प्रताड़ित करता है तो दान देने और उस पैसे के दुरुपयोग का कर्मफल आपको मिलेगा।

और यह मिला जुला फल इस तरह हो सकता है जैसे कोई अमीर व्यक्ति कुत्ता पालता है उसके लिए अलग कमरे की व्यवस्था करता है जिसमें एयरकंडिशन या हीटर, अच्छे बिस्तर, खाने के लिए अच्छा भोजन, सेवा करने के लिए अलग नौकर या वही अमीर व्यक्ति उस कुत्ते का नौकर बन जाता है। मालिक की सीट पर कुत्ता और ड्राइवर की सीट पर मालिक बैठता है।

आप समझ रहे होंगे कि यह अमीर आदमी को मिला कर्मफल है। जी नहीं यह कर्मफल उस कुत्ते द्वारा किये गए पूर्वजन्म के कर्मों का है जिसे सुविधाएं तो सारी मिली हैं लेकिन शरीर कुत्ते का मिल गया। उन सुविधाओं को भोग भी रहा है लेकिन आनन्द नहीं ले पा रहा क्योंकि उसने गुरु बिना दान पुण्य किया।

अर्थात गुरु के बिना कोई भी भक्ति कर्म निष्फल है। यदि आपको मनुष्य जीवन में सुख व उसके बाद मोक्ष प्राप्ति चाहिए तो गीता में बताये गए तत्वदर्शी सन्त की खोज कर उन्हें गुरु बनाये और अपना कल्याण करवाइये।

वह तत्वदर्शी सन्त जिसके विषय में गीता में बताया व उसकी पहचान जो गीता में बताई गयी है वह तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज हैं।

आप सभी से करबद्ध निवेदन है कि मकर सक्रांति पर निःशुल्क पुस्तक ज्ञान गंगा मंगवाएं और ज्ञान यज्ञ कीजिए जो कि द्रव्यमय की अपेक्षा श्रेष्ठ है जैसा कि गीता में बताया है।

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