कबीर साहेब जी के नाम से बने बारह (12) नकली पंथों की विस्तृत जानकारी

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संत कबीर दास के नाम से सभी अच्छी तरह से परिचित हैं लेकिन जिन कबीर दास के दोहे और कबीर दास के भजन या कबीर दास की साखी हम पढ़ते सुनते है उन कबीर साहेब जी के बारे में बहुत से रहस्य ऐसे हैं जिनसे पर्दा उठना अभी भी बाकी है। इन रहस्यों से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर आज हम खोजेंगे। 

एक प्रश्न जो अक्सर पूछा जाता है कि कबीर दास जी की क्या जाति थी या कबीर दास जी कौन सी जाति के थे?हालांकि संसार कबीर साहेब की परवरिश की लीला एक जुलाहे के घर होने के कारण उन्हें एक बुनकर या धाणक मानता है। परन्तु कबीर साहेब वास्तविक स्वामी रामानंद जी से हुई चर्चा की वाणी में गरीब दास जी बताते हैं कि

जाति हमारी जगतगुरु, परमेश्वर है पंथ।

गरीबदास लिखित पढे, मेरा नाम निरंजन कंत।।

कबीर साहेब की परवरिश की लीला मुंह बोले माता पिता नीरू और नीमा के घर हुई। जिन्हें वह लहर तारा तालाब में कमल के फूल पर एक शिशु रूप में प्राप्त हुए थे। पर कबीर साहेब जी के कोई माता पिता नहीं है बल्कि वे सर्व सृष्टि के जनक और पालनहार है। अपनी वाणी में कबीर साहेब प्रमाणित करते हैं ।

कबीर मात पिता मेरे कछू नाही, न मेरे घर दासी ।

जुलहे का सुत आन कहाया, जगत करै मेरी हासी।।

कबीर पंथ दो शब्दों का मेल है कबीर + पंथ जिसका भावार्थ है कबीर साहेब जी का पंथ अर्थात् मार्ग या रास्ता । जो मार्ग कबीर साहेब ने बताया उस पर चलने वाले को कबीरपंथी कहते हैं।

कबीर साहेब के कुल बारह पंथ है। जिनमें से प्रथम पंथ की बात करते हैं। कबीर साहेब जी के परम शिष्य थे सेठ धनी धर्मदास जी पर संत धर्मदास जी का ज्येष्ठ पुत्र श्री नारायण दास काल का भेजा हुआ दूत था। उसने बार-बार समझाने से भी परमेश्वर कबीर साहेब जी से उपदेश नहीं लिया। पुत्र प्रेम में व्याकुल संत धर्मदास जी को परमेश्वर कबीर साहेब जी ने नारायण दास जी का वास्तविक स्वरूप दर्शाया। संत धर्मदास जी ने कहा कि हे प्रभु ! मेरा वंश तो काल का वंश होगा इससे वे अति चिंतित थे। परमेश्वर कबीर साहेब जी ने कहा कि धर्मदास वंश की चिंता मत कर।

तेरा बयालीस पीढ़ी तक वंश चलेगा। तब धर्मदास जी ने पूछा कि हे दीन दयाल! मेरा तो इकलौता पुत्र नारायण दास ही है। तब परमेश्वर ने कहा कि आपको एक शुभ संतान पुत्र रूप में मेरे आदेश से प्राप्त होगी। उससे तेरा वंश चलेगा। उसका नाम चूड़ामणी रखना। कुछ समय पश्चात् भक्तमति आमिनी देवी को संतान रूप में पुत्र प्राप्त हुआ उसका नाम श्री चूड़ामणी जी रखा गया। बड़ा पुत्र नारायण दास अपने छोटे भाई चूड़ामणी जी से द्वेष करने लगा। जिस कारण से श्री चूड़ामणी जी बांधवगढ़ त्याग कर कुदुर्माल नामक शहर (मध्य प्रदेश) में रहने लगा। 

कबीर परमेश्वर जी ने संत धर्मदास जी से कहा था कि अपने पुत्र चूड़ामणी को केवल प्रथम मंत्र देना जिससे इनमें धार्मिकता बनी रहेगी तथा वंश चलता रहेगा। कबीर साहेब जी ने धर्मदास जी से कहा था कि आपकी सातवीं पीढ़ी में काल का दूत आएगा। वह इस वास्तविक प्रथम मन्त्र को भी समाप्त करके मनमुखी अन्य नाम चलाएगा। शेष धार्मिकता का अंत ग्यारहवां, तेरहवां तथा सतरहवां गद्दी वाला महंत कर देंगे। इस प्रकार तेरे वंश से भक्ति तो समाप्त हो जाएगी। परंतु तेरा वंश फिर भी बयालीस (42) पीढ़ी तक चलेगा। फिर तेरा वंश नष्ट हो जाएगा जिसका प्रमाण कबीर साहेब की लिखी वाणी से मिलता है।

सुन धर्मनि जो वंश नशाई, जिनकी कथा कहूँ समझाई।।

काल चपेटा देवै आई, मम सिर नहीं दोष कछु भाई।।

सप्त, एकादश, त्रयोदस अंशा, अरु सत्रह ये चारों वंशा।।

 इनको काल छलेगा भाई, मिथ्या वचन हमारा न जाई।।

जब-2 वंश हानि होई जाई, शाखा वंश करै गुरुवाई।।

 दस हजार शाखा होई है, पुरुष अंश वो ही कहलाही है।।

 वंश भेद यही है सारा, मूढ जीव पावै नहीं पारा।।99।। 

भटकत फिरि हैं दोरहि दौरा, वंश बिलाय गये केही ठौरा।।

सब अपनी बुद्धि कहै भाई, अंश वंश सब गए नसाई।।

उपरोक्त वाणी में कबीर परमेश्वर ने कहा कि धर्मदास तेरे वंश से भक्ति नष्ट हो जाएगी वह कथा सुनाता हूँ। सातवीं पीढ़ी में काल का दूत उत्पन्न होगा। वह तेरे वंश से भक्ति समाप्त कर देगा। जो प्रथम मन्त्र आप दान करोगे उसके स्थान पर अन्य मनमुखी नाम प्रारंभ करेगा। धार्मिकता का शेष विनाश ग्यारहवां, तेरहवां तथा सतरहवां महंत करेगा। मेरा वचन खाली नहीं जाएगा भाई। सर्व अंश वंश भक्ति हीन हो जाएंगे। अपनी-2 मन मुखी साधना किया करेंगे। 

धर्मदास जी के वंश में तेरहवें महंत दयानाम के बाद कबीर पंथ में उथल-पुथल मची। क्योंकि इस परंपरा में कोई पुत्र नहीं था। तब तक व्यवस्था बनाए रखने के लिए महंत काशीदास जी को चादर दिया गया। कुछ समय पश्चात् काशी दास ने स्वयं को कबीर पंथ का आचार्य घोषित कर दिया तथा खरसीया में अलग गद्दी की स्थापना कर दी। यह देख तीनों माताएं रोने लगी कि काल का चक्र चलने लगा। बाद में कबीर पंथ के हित में ढाई वर्ष के बालक चतुर्भुज साहेब को बड़ी माता साहिब ने गद्दी सौंपी जो “गृृन्धमुनि नाम साहेब” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस बात पर भी विचार नही किया गया कि एक ढाई वर्ष का बालक क्या नाम व ज्ञान देगा? लेकिन माता जी ने बच्चे को गद्दी पर बैठा दिया और बेटा महंत बन गया। महंत काशी दास जी ने खरसिया शहर में नकली कबीर पंथी गद्दी प्रारम्भ कर दी।

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काशीदास द्वारा खरसिया में संचालित कबीर पंथ से एक उदीतनाम साहेब ने मनमुखी गद्दी लहर तारा तालाब पर काशी (बनारस) में चालु कर रखी है। कबीर चौरा काशी में एक गंगाशरण शास्त्री जी भी महंत पद पर विराजमान है। परंतु भक्ति का क-ख भी ज्ञान इनमे से किसी को भी नहीं है।

कबीर साहिब जी के नाम से काल ने बारह नकली पंथ चलाने की बात कही थी। जिनका उद्देश्य ये था कि कबीर साहेब के नाम से दुनिया में गलत पूजा विधि का प्रचार करना ताकि मनुष्य मोक्ष नही प्राप्त कर सके और गलत साधना में ही लगा रहे। इन नकली पंथों के बारे में कबीर साहेब ने पहले ही बता दिया था। अब उन पंथों के बारे में जानते हैं । 

कबीर साहेब के पंथ में काल द्वारा प्रचलित बारह पंथों का विवरण कबीर चरित्र बोध (कबीर सागर) पृष्ठ नं. 1870  से:- 

  1. नारायण दास जी का पंथ ( यह चूड़ामणी जी का पंथ है नारायण दास जी ने तो कबीर पंथ को स्वीकार ही नहीं किया था)।
  2. यागौदास (जागू) पंथ
  3. सूरत गोपाल पंथ 
  4. मूल निरंजन पंथ
  5. टकसार पंथ 
  6. भगवान दास (ब्रह्म) पंथ
  7. सत्यनामी पंथ
  8. कमाली (कमाल का) पंथ
  9. राम कबीर पंथ 
  10. प्रेम धाम (परम धाम) की वाणी पंथ
  11. जीवा पंथ 
  12. गरीबदास पंथ। 

इन सभी 12 पंथों से दिक्षित जीवो का मोक्ष नही हो सका।

कबीर साहेब ने कबीर सागर में कबीर वाणी नामक अध्याय में पृष्ठ 136-137 पर बारह पंथों का विवरण देते हुए वाणी लिखी हैं जो निम्न हैं :- 

सम्वत् सत्रासै पचहत्तर होई, तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई। 

साखी हमारी ले जीव समझावै, असंख्य जन्म ठौर नहीं पावै। 

बारवें पंथ प्रगट ह्नै बानी, शब्द हमारे की निर्णय ठानी। 

अस्थिर घर का मरम न पावैं, ये बारा पंथ हमही को ध्यावैं।

 बारवें पंथ हम ही चलि आवैं, सब पंथ मेटि एक ही पंथ चलावें

उपरोक्त वाणी में ‘‘बारह पंथों’’ का विवरण किया है तथा लिखा है कि संवत 1775 में प्रभु का प्रेम प्रकट होगा तथा हमरी वाणी प्रकट होगी। (संत गरीबदास जी महाराज छुड़ानी हरियाणा वाले का जन्म 1774 में हुआ है उनको प्रभु कबीर 1784 में मिले थे। यहाँ पर इसी का वर्णन है तथा संवत 1775 के स्थान पर 1774 होना चाहिए, गलती से 1775 लिखा है)। 

भावार्थ है कि बारहवां पंथ जो गरीबदास जी का चलेगा यह पंथ हमारी साखी लेकर जीव को समझाएगें। परन्तु वास्तविक मंत्र से अपरिचित होने के कारण साधक असंख्य जन्म सतलोक नहीं जा सकते। उपरोक्त बारह पंथ हमको ही प्रमाण करके भक्ति करेंगे परन्तु स्थाई स्थान (सतलोक) प्राप्त नहीं कर सकते। बारहवें पंथ (गरीबदास वाले पंथ) में आगे चलकर हम (कबीर जी) स्वयं ही आएंगे तथा सब बारह पंथों को मिटा एक ही पंथ चलाएंगे। उस समय तक सार शब्द छुपा कर रखना है। यही प्रमाण संत गरीबदास जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी ‘‘असुर निकन्दन रमैणी’’ में किया है कि 

‘‘सतगुरु दिल्ली मण्डल आयसी, 

सूती धरती सूम जगायसी’’ 

पुराना रोहतक तहसील दिल्ली मण्डल कहलाता है। जो पहले अंग्रेजों के शासन काल में केंद्र के आधीन था। बारह पंथों का विवरण कबीर चरित्र बोध (बोध सागर) पृृष्ठ नं. 1870 पर भी है जिसमें बारहवां पंथ गरीबदास लिखा है। 

कबीर साहेब जी ने कबीर सागर में कबीर वाणी पृष्ठ 134 पर लिखा है:-

 “बारहवें वंश प्रकट होय उजियारा, 

तेरहवें वंश मिटे सकल अंधियारा”

भावार्थ:- कबीर परमेश्वर ने अपनी वाणी में काल से कहा था कि जब तेरे बारह पंथ चल चुके होंगे तब मैं अपना नाद (वचन-शिष्य परम्परा वाला) वंश अथार्त् अंश भेजूंगा। उसी आधार पर यह विवरण लिखा है। बारहवां वंश (अंश) संत गरीबदास जी कबीर वाणी तथा परमेश्वर कबीर जी की महिमा का कुछ-कुछ संशय युक्त विस्तार करेगा। जैसे संत गरीबदास जी की परम्परा में परमेश्वर कबीर जी को विष्णु अवतार मान कर साधना तथा प्रचार करते हैं। इसलिए लिखा है कि तेरहवां वंश (अंश) पूर्ण रूप से अज्ञान अंधेरा समाप्त करके परमेश्वर कबीर जी की वास्तविक महिमा तथा नाम का ज्ञान करा कर सभी पंथों को समाप्त करके एक ही पंथ चलाएगा, वह तेरहवां वंश हम ही खुद कबीर साहेब होंगे। 

कबीर साहेब ने अपने पंथ में होने वाली मिलावट के बारे में पहले ही बताया था। इसी क्रम में 12 पंथ तक पूर्ण मोक्ष के मार्ग के उजागर नही होने की बात कही थी और बताया था कि 13वे पंथ में खुद कबीर साहेब आएंगे। आज वर्तमान में 13 वे पंथ में संत रामपाल जी महाराज के द्वारा कबीर साहेब जी का तेरहवां वास्तविक मार्ग अर्थात् यथार्थ कबीर पंथ चलाया जा रहा है। जिससे सर्व पंथ मिट कर एक पंथ ही रह जाएगा।

कबीर परमात्मा ने स्वसमवेद बोध पृष्ठ 171 (1515) पर एक दोहे में इसका वर्णन किया है, जो इस प्रकार है:-

पाँच हजार अरू पाँच सौ पाँच जब कलयुग बीत जाय।

महापुरूष फरमान तब, जग तारन कूं आय।

हिन्दु तुर्क आदि सबै, जेते जीव जहान।

सत्य नाम की साख गही, पावैं पद निर्वान।

सबही नारी-नर शुद्ध तब, जब ठीक का दिन आवंत।

कपट चातुरी छोडी के, शरण कबीर गहंत।

एक अनेक ह्नै गए, पुनः अनेक हों एक।

हंस चलै सतलोक सब, सत्यनाम की टेक।

आज संत रामपाल जी महाराज ने कबीर साहेब के ज्ञान का पिटारा हम सब के लिए खोल दिया है। उस अद्भुत ज्ञान से परिचित होने के लिए पढ़े पुस्तक ज्ञान गंगा

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