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रक्षा बंधन की परम्परा पति-पत्नी के लिए या भाई-बहन के लिए ?

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“भविष्य पुराण” के अनुसार राजा इंद्र बारह वर्षों तक लगातार असुरों से पराजित हो रहे थे तो इंद्र की पत्नी सचि ने तप किया और एक रक्षा सूत्र तैयार किया जिसे ब्राह्मणों द्वारा सचि के पति इंद्र की कलाई पर बांधा गया और तभी से रक्षाबंधन का त्यौहार ब्राह्मणों द्वारा मनाया जाने लगा। उस दिन से श्रावन पूर्णिमा के दिन ये रेशमी धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह बात भी प्रचलित है कि जब सैनिक युद्ध पर जाते थे तो पत्नी द्वारा अपने पति को माथे पर कुमकुम और हाथ में रेशम का रुमाल रक्षा सूत्र के तौर पर बांधा जाता था ताकि पति युद्ध में सुरक्षित विजयी होकर घर को लौटे लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ? चूंकि रक्षाबंधन जैसे इस आडम्बर के बाद भी उन सैनिकों की स्त्रियां विधवा होकर संताप भरा जीवन यापन करती रही। इस रक्षा सूत्र से रक्षा होने की सच्चाई भी निराधार और बेबुनियाद ही सिद्ध हुई।
निम्न कथाओं से यह भी साबित हुआ कि रक्षा बंधन का पर्व सिर्फ भाई-बहनों के लिए ही नहीं है बल्कि पति-पत्नी भी इस बेतरतीब परम्परा के झूठे भ्रम से नहीं बच पाए। विचारणीय बात है कि पुराणों के आधार पर ही भाई बनाने की और बहन बनाने की प्रथा शरू हुई और पुराणों को ही आधार मानकर पत्नी अपने पति को रक्षा सूत्र बांध रही है। अर्थात् यहां पर यह सिद्ध हुआ कि यह रक्षाबंधन परम्परा सिर्फ दन्त कथा, अर्थात् सुनी सुनाई कथाओं के आधार पर ही आधारित है।

क्या सिर्फ बहन ही भाई को रक्षा सूत्र बांध सकती है ?

अगर यह पर्व सिर्फ भाई-बहनों का ही पर्व है तो फिर जिन बहनों के भाई नहीं वह बहने क्या करें?
रक्षा बंधन के दिन बहने अपने भाइयों को रक्षा सूत्र (राखी) बांधती हैं। लेकिन जिन बहनों के भाई नहीं होते उनकी आत्मा दुखती है और अन्य बहनों को अपने भाई की कलाई में राखी बांधते हुए देखकर मन ही मन कुंठित होती है। लेकिन बात यहाँ भी बिगड़ गई क्योंकि अब घर की बेटियों द्वारा ब्राह्मणों, गुरुओं, सगे संबंधियों जैसे पुत्री द्वारा पिता को भी राखी बांधी जाने लगी है। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बांधी जाती है। यहां तक कि आज कल तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को भी राखी बांधने की परम्परा शुरु हो चुकी है। इतना ही नहीं बल्कि आधुनिक यंत्र जैसे टीवी, फ्रिज, कूलर, वाहनों को भी यह रक्षा सूत्र बांधा जाने लगा है। तयौहर के नाम पर उलझी हुई इस गुत्थी से तो यह साबित होता है कि रक्षा बंधन के नाम पर रिश्तों का रायता बुरी तरह फैल चुका है।क्योंकि यह त्यौहार अब सिर्फ भाई बहन के रिश्ते पर ही निर्भर नही रहा बल्कि रक्षा और स्नेह के नाम पर मन को समझाने वाला आडंबर मात्र है।

जिस बहन का भाई नहीं उस बहन की रक्षा कौन करता है?

समाज में कैसी-कैसी मान्यताएं प्रचलित हैं कि बहन अपने भाई को रक्षा सूत्र इसलिए बांधती है ताकि भाई-बहन की रक्षा कर सके और बहन भी उम्मीद करती है कि मेरे द्वारा बांधे गए इस रक्षा सूत्र से मेरे भाई की रक्षा होगी। लेकिन क्या सच में भाई अपनी बहन की रक्षा करने में सक्षम है या बहन के पास वह सामर्थ्य है कि अपने भाई पर आने वाले संकटो को टाल सके? एक बहन ने बखूबी ध्यान रखा कि क्या है राखी बांधने का शुभ मुहूर्त और उसी राखी के दिन अपने भाई का शहर से घर लौटने का इंतजार कर रही थी। सोचा भाई आज शहर से घर लौट रहा है। उसे राखी बांधूंगी, लेकिन बीच रास्ते में ही भाई की एक दुर्घटना में मौत हो गई और भाई की जगह उसकी लाश आई। जिस रक्षा करने वाले भाई का इंतजार बहन बड़ी बेसबरी से कर रही थी वो खुद अपनी रक्षा नहीं कर पाया और ना ही बहन का रक्षा सूत्र अपने भाई की इस अकाल मृत्यु को टाल पाया तो फिर रक्षा सूत्र का यह कैसा अंधविश्वास है जिसे एक परम्परा के तहत घसीटा जा रहा है।

भाई के बस की बात नहीं की वह खुद की या अपनी बहन की रक्षा कर सके।

पूर्ण परमात्मा ही सबका रक्षक है। उसके अलावा अगर मनुष्य चाहे तो अपनी इच्छा से एक भी श्वास ज्यादा नहीं ले सकता है, लेकिन पूर्ण परमात्मा समरथ है जो अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है। रक्षा करने का असली सामर्थ्य सिर्फ पूर्ण परमात्मा ही रखता है जिसे किसी भी रक्षा सूत्र की जरूरत नहीं होती। इंसान के शरीर में 36 जोड़ लगे हैं, ना जाने शरीर का कौन सा पुर्जा कब बंद हो जाये, फिर भी इंसान सोचता है कि मैं कभी नहीं मरूँगा, जो बहन भाई से रक्षा की उम्मीद करती है उसे समझना होगा कि क्या भाई के लिए उसका प्यार सिर्फ एक रक्षा बंधन के दिन ही है, क्या उसके अलावा पूरे साल में जितने भी दिन बीते उनमें उसका अपने भाई के प्रति प्यार नहीं था, या भाई का अपनी बहन के प्रति? जरूरी तो नहीं की बहन अपने भाई को राखी बांधकर या भाई अपनी बहन को वीरपस (भाई द्वारा बहन को रक्षा बंधन का निमंत्रण) देकर ही यह साबित करे की मैं तेरा हितैषी, प्रिय, भला चाहने वाला हूँ।

रक्षा बंधन की परम्परा पर लोगों की अनेक भ्रांतियां- क्या है सच जरूर जानिए

“महाभारत के अनुसार” जब श्री कृष्ण जी का सुदर्शन चक्र शिशुपाल का वध करके वापस श्री कृष्ण जी के पास पहुँचा तो सुदर्शन चक्र से श्री कृष्ण जी की उंगली कट गई और रक्त बहने लगा, तुरन्त द्रोपदी ने अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर श्री कृष्ण जी की उंगली पर बांध दिया।
बदले में श्री कृष्ण जी ने द्रोपदी की रक्षा का वादा किया।
यह दिन श्रावण मास पूर्णिमा का दिन था। मान्यता है कि तभी से भाई-बहन का त्यौहार रक्षाबंधन शुरु हुआ। इस बार रक्षा बंधन 26 अगस्त 2018 को है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। महाभारत में उल्लेख है कि युधिष्ठिर ने महाभारत के दौरान श्री कृष्ण जी से संकटों को पार करने का उपाय पूछा तो कृष्ण जी ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए रक्षा बंधन का त्यौहार मनाने की सलाह दी। कृष्ण का मानना था कि रेशमी धागा बांधने से रक्षा हो सकती है। लेकिन क्या कृष्ण जी के इस उपाय के बाद सभी सैनिक अपने घर वापस सुरक्षित लौट सके?
“वामन पुराण” के अनुसार राजा बलि ने विष्णु जी को तीन पग धरती देने के बाद विष्णु जी से वरदान मांगा की आप पाताल में मेरे साथ रहो, इसी तरह राजा बलि ने भक्ति के बल पर विष्णु जी को अपना द्वारपाल बनाकर रख लिया लेकिन देवी लक्ष्मी ने विष्णु जी को मुक्त कराने अर्थात बैकुंठ धाम वापस ले जाने के लिए राजा बलि को अपना भाई बनाया और विष्णु जी को बैकुंठ धाम लेकर गई और वहीं से रक्षा बंधन का यह त्यौहार शरू हुआ। उपरोक्त कथाएं घटनाओं की तरह प्रतीत होती हैं। जैसे कोई दन्त कथा हो, जिस वजह से इस रक्षा बंधन परंपरा का कोई ठोस प्रमाण नजर नहीं आता ताकि इस पर्व की विशेषता और आवश्यकता सिद्ध हो। इन बेबुनियाद परम्पराओं के चक्कर में मनुष्य अपने जीवन का मूल उद्देश्य ही भूलता चला जा रहा है।

आखिर क्या है मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य –
और कौन है पूर्ण परमात्मा जानिए
जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपालजी महाराज से।

संत रामपालजी महाराज ने हमेशा से ही रूढ़िवादिता और आडंबर युक्त अंध-श्रद्धा का विरोध किया है। हर वर्ष व्यक्ति कैलेण्डर के पन्ने उलट कर देखता है कि रक्षा बंधन कितनी तारीख को है? और फिर त्यौहार मनाने के चक्कर में कर्ज भी करता है जिसे चुकाने की चिन्ता में फिर रात को सोना भी दुश्वार हो जाता है। लेकिन संत रामपालजी महाराज के अनुसार राखी का त्यौहार एक अंध-श्रद्धा है जिसमें रक्षा के नाम पर सिर्फ इस पर्व को मनमाना आचरण करके चलाया जा रहा है क्योंकि सर्व सद्ग्रन्थ इस बात की गवाही देते है कि अगर जीव की रक्षा करने में कोई शक्ति सक्षम है तो वो है पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी। कोई भी जीव चाहे वो मनुष्य हो चाहे पशु, देवता हो, चाहे दानव, अपनी खुद की रक्षा भी ठीक से नहीं कर सकता है तो अपनी बहन की रक्षा कब करेगा। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी समय अनुसार अपनी रक्षा नहीं कर पाए थे और ऐसे में पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब ही चारो युगों में अलग-अलग नाम से प्रकट होकर इनकी सहायता करते हैं, रक्षा करते हैं। संत रामपालजी महाराज के अनुसार यह रक्षा बंधन परम्परा गलत है क्योंकि उनका कहना है कि अगर सच में ही आप अपनी बहन की या भाई की रक्षा चाहते हैं तो इस रक्षा बंधन जैसे अंधविश्वास को त्यागो और पूर्ण परमात्मा की शरण ग्रहण करो। वही तुम्हारा सच्चा रक्षक है। मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य है सतभक्ति करके हमेशा-हमेशा के लिए जन्म मरण से छुटकारा पाकर अपने निजधाम सतलोक में स्थायी स्थान प्राप्त करना, जहाँ ना मौत है और ना ही बुढ़ापा है, जहां आत्माएं सदैव अमर हैं, ना ही कोई कष्ट है और ना ही किसी से रक्षा की भीख मांगनी पड़ती है। क्योंकि उस लोक सतलोक में ना द्वेष है और ना ही कोई कहर है, वहां पर सिर्फ पूर्ण परमात्मा कबीर जी की सुखद मेहर ही मेहर है।

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