अरावली पर संकट: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा के बाद क्यों तेज हुआ Save Aravalli अभियान

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दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवंबर 2025 में अरावली पर्वतमाला की एक समान परिभाषा तय किए जाने के बाद राजस्थान सहित उत्तर भारत में #SaveAravalli अभियान तेज हो गया है। 

पर्यावरणविदों के साथ अब राजनीतिक नेता और नागरिक समूह भी इस मुहिम में शामिल हो रहे हैं। कोर्ट ने नई खनन लीज पर रोक लगाई है, लेकिन 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाओं को ही अरावली मानने के फैसले ने संरक्षण को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।

अरावली संरक्षण से जुड़े प्रमुख तथ्य (Key Takeaways on Aravalli Range)

  • अरावली पर्वतमाला करीब दो अरब वर्ष पुरानी मानी जाती है
  • यह श्रृंखला दिल्ली से गुजरात तक लगभग 650 किमी में फैली है
  • सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली की एक समान परिभाषा तय की
  • अब 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाएं ही अरावली मानी जाएंगी
  • नए खनन पट्टों पर रोक, लेकिन सीमित और नियंत्रित खनन की अनुमति
  • 11 दिसंबर 2025 को अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर Save Aravalli अभियान शुरू
  • जून 2025 में केंद्र सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट लॉन्च किया

अरावली पर्वतमाला: भौगोलिक और पर्यावरणीय महत्व

अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जिसकी आयु लगभग दो अरब वर्ष आंकी जाती है। यह पर्वतमाला दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है और हरियाणा, राजस्थान तथा गुजरात से होकर गुजरती है। उत्तर-पश्चिम भारत में यह एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक रीढ़ के रूप में काम करती है।

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पर्यावरणीय दृष्टि से अरावली की भूमिका बेहद अहम है। यह थार रेगिस्तान को पूर्व दिशा में फैलने से रोकती है और उपजाऊ इंडो-गंगा के मैदानों की रक्षा करती है। इसके साथ ही यह भूजल रिचार्ज, जलवायु संतुलन और जैव विविधता संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। चंबल, साबरमती और लूणी जैसी कई प्रमुख नदियां अरावली प्रणाली से निकलती हैं या इससे पोषित होती हैं।

खनन और पर्यावरणीय क्षरण की समस्या

अरावली क्षेत्र खनिज संसाधनों से समृद्ध है। यहां चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, तांबा, जस्ता और टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं। इसी वजह से यह क्षेत्र लंबे समय से खनन गतिविधियों का केंद्र रहा है।

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हालांकि, बीते दशकों में अत्यधिक और अनियंत्रित खनन के कारण अरावली को भारी नुकसान पहुंचा है। जंगलों का क्षरण हुआ, भूजल स्तर गिरा और खासकर दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता पर इसका नकारात्मक असर पड़ा। 1990 के दशक की शुरुआत से पर्यावरण मंत्रालय ने खनन पर नियंत्रण के लिए नियम बनाए, लेकिन इसके बावजूद हरियाणा और राजस्थान के कई हिस्सों में अवैध खनन जारी रहा।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और 2009 का प्रतिबंध

खनन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और मेवात जिलों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, इसके बावजूद प्रवर्तन से जुड़ी चुनौतियां बनी रहीं और अवैध गतिविधियां पूरी तरह नहीं रुक सकीं।

भारत की संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम संधि के प्रति प्रतिबद्धताओं और दीर्घकालिक पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया।

अरावली की एक समान परिभाषा और 2025 का फैसला

अरावली संरक्षण की राह में सबसे बड़ी समस्या इसकी एक समान परिभाषा का अभाव रही है। अलग-अलग राज्यों और एजेंसियों द्वारा अलग-अलग मानक अपनाए जाने से नियामकीय खामियां सामने आईं।

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इसी को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन सर्वेक्षण, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, राज्य वन विभागों और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) के प्रतिनिधियों वाली एक समिति गठित की। 2025 में कोर्ट ने समिति की सिफारिश स्वीकार करते हुए 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा माना।

कोर्ट ने माना कि यह परिभाषा पहले की ढलान या बफर आधारित परिभाषाओं की तुलना में अधिक व्यावहारिक है।

केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की सिफारिशें

CEC ने अरावली संरक्षण के लिए एक बहुस्तरीय और वैज्ञानिक रणनीति सुझाई, जिसमें शामिल हैं:

  • सभी राज्यों में अरावली की वैज्ञानिक मैपिंग
  • खनन गतिविधियों का व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन
  • वन्यजीव गलियारों, जल स्रोतों और एक्विफर क्षेत्रों में खनन पर रोक
  • नई खनन लीज या नवीनीकरण पर अस्थायी रोक
  • वायु प्रदूषण फैलाने वाली स्टोन क्रशिंग इकाइयों का कड़ा नियमन

इन सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 के आदेश में स्वीकार किया।

Save Aravalli अभियान क्यों हुआ तेज

सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले के बाद अरावली को लेकर चिंता की लहर दौड़ गई। आलोचकों का कहना है कि 100 मीटर की सीमा के कारण अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है।

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इसी के विरोध में 11 दिसंबर 2025 को अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस के अवसर पर ‘अरावली विरासत जन अभियान’ शुरू किया गया। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड करने लगा। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 18 दिसंबर को अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल तस्वीर बदलकर इस अभियान का समर्थन किया और केंद्र सरकार व सुप्रीम कोर्ट से परिभाषा पर पुनर्विचार की अपील की। कांग्रेस नेता अजय माकन ने इसे जलवायु संकट से जोड़ा।

अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट और संतुलित दृष्टिकोण

सकारात्मक पहल के रूप में जून 2025 में केंद्र सरकार ने ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ लॉन्च किया। यह परियोजना अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल से प्रेरित है। इसका उद्देश्य गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों में पांच किलोमीटर चौड़ी हरित पट्टी विकसित करना है।

इस परियोजना का लक्ष्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियंत्रित और टिकाऊ खनन का रास्ता अपनाया है।

अरावली संरक्षण पर आगे की राह

अरावली को लेकर मौजूदा बहस यह दर्शाती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कितना जटिल है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, CEC की सिफारिशें और Save Aravalli जैसे अभियानों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया है। आने वाले समय में अरावली की वैज्ञानिक मैपिंग, सस्टेनेबल माइनिंग और ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन पर ही इसका भविष्य निर्भर करेगा।

FAQs on Aravalli Range in Hindi

Q1. अरावली पर्वतमाला कितनी पुरानी मानी जाती है?

लगभग दो अरब वर्ष पुरानी।

Q2. सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा कब तय की?

नवंबर 2025 में।

Q3. नई परिभाषा के अनुसार अरावली क्या मानी जाएगी?

100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाएं।

Q4. Save Aravalli अभियान कब शुरू हुआ?

11 दिसंबर 2025 को।

Q5. अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट कब लॉन्च हुआ?

जून 2025 में।

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