हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के मिर्जापुर क्षेत्र के एक परिवार के सामने अपनी 5 महीने की नवजात बच्ची को बचाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया था। बच्ची को जन्म से ही लिवर की एक दुर्लभ और जानलेवा बीमारी थी, जिसका एकमात्र इलाज ₹18 लाख का तत्काल लिवर ट्रांसप्लांट था। अपनी जमा-पूंजी गंवा चुके और हर दरवाजे से निराश लौट चुके इस परिवार की पुकार संत रामपाल जी महाराज ने सुनी। उन्होंने बिना किसी देरी या कागजी शर्त के, अस्पताल में तत्काल भर्ती कराने के लिए मौके पर ही ₹5 लाख नकद प्रदान किए और शेष ₹13 लाख या उससे अधिक, अर्थात् पूर्ण इलाज का खर्च सीधे अस्पताल के खाते में जमा कराने की जिम्मेदारी ली।
पहले की स्थिति: दुर्लभ बीमारी और बेबस परिवार
कुरुक्षेत्र निवासी राकेश और उनकी पत्नी श्वेता की 5 महीने की बेटी जन्म से ही ‘बिलियरी एट्रेसिया’ (Biliary Atresia) नामक एक गंभीर बीमारी से पीड़ित है, जो लगभग 4 लाख बच्चों में से किसी एक को होती है। जन्म के 15 दिन बाद भी बच्ची का पीलिया और बुखार ठीक नहीं हुआ और उसका पेट लगातार फूलता जा रहा था।
परिवार ने पहले चंडीगढ़ पीजीआई (PGI) में बच्ची का 6 से 7 घंटे लंबा ऑपरेशन करवाया, जिसमें डॉक्टरों ने बचने की केवल 20-30% संभावना जताई थी। इस इलाज में परिवार के पास मौजूद ₹3 से ₹4 लाख की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई, लेकिन ऑपरेशन सफल नहीं हुआ। बच्ची की बिगड़ती हालत को देखते हुए गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल के डॉक्टरों ने तत्काल लिवर ट्रांसप्लांट करने को कहा, जिसका अनुमानित खर्च ₹18 लाख बताया गया। अस्पताल में फाइल शुरू करने और बच्ची को एडमिट करने के लिए ₹5 लाख तुरंत जमा कराने थे।
बच्ची के पिता राकेश पिछले चार महीनों से काम पर नहीं जा पा रहे थे और बच्ची के मामा अभिषेक ने भी अपनी नौकरी छोड़कर रिश्तेदारों व समाज के सामने मदद की गुहार लगाई, लेकिन इतनी बड़ी रकम कहीं से नहीं जुट सकी।
संत रामपाल जी महाराज का हस्तक्षेप और तत्काल सहायता
हर तरफ से टूट चुका यह परिवार (जिसने संत जी से नाम दीक्षा भी नहीं ली थी) एक रिश्तेदार के बताने पर अपनी अंतिम उम्मीद लेकर सतलोक आश्रम (धनाना धाम) पहुंचा और संत रामपाल जी महाराज के समक्ष अपनी पीड़ा रखी।
बच्ची की गंभीर स्थिति और समय की कमी को देखते हुए संत रामपाल जी महाराज ने एक क्षण का भी विलंब नहीं किया। जब पिता ने बताया कि कुल खर्च ₹18 लाख है और एडमिशन के लिए ₹5 लाख अभी चाहिए, तो संत रामपाल जी महाराज ने तुरंत मौके पर ही ₹5 लाख की नकद राशि परिवार के हाथों में सौंप दी। उन्होंने परिवार को आश्वस्त करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा,
“बेटा, इलाज शुरू करवाओ। पैसे की वजह से इस बच्ची को मरने नहीं देंगे। अस्पताल का अकाउंट नंबर दे दो, बाकी का सारा पैसा ट्रस्ट से सीधे अस्पताल के खाते में डलवा देंगे।”
सहायता से पहले और बाद की स्थिति
| विवरण | पहले की स्थिति | संत रामपाल जी महाराज की सहायता के बाद |
| चिकित्सा संकट | PGI में ऑपरेशन असफल होने के बाद बच्ची की जान बचाने के लिए तत्काल लिवर ट्रांसप्लांट आवश्यक था। | मेदांता अस्पताल में तुरंत इलाज और ट्रांसप्लांट शुरू कराने का रास्ता साफ हुआ। |
| आर्थिक स्थिति | ₹4 लाख खर्च हो चुके थे; पिता और मामा का रोजगार छूट चुका था और ₹18 लाख जुटाना असंभव था। | संत जी ने मौके पर ही ₹5 लाख नकद दिए और पूरे ₹18 लाख (या उससे अधिक) के खर्च की जिम्मेदारी ली। |
| सहायता की प्रक्रिया | परिवार कई जगहों पर मदद की भीख मांग चुका था, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। | बिना किसी भेदभाव (गैर-दीक्षित परिवार होने के बावजूद) एक ही मिनट में पूरी मदद स्वीकृत कर दी गई। |
| परिवार की मानसिक स्थिति | बच्ची को आंखों के सामने तड़पता देख पूरा परिवार टूट चुका था और घोर निराशा में था। | आश्रम से बाहर निकलते समय परिवार की आंखों में राहत और कृतज्ञता के आंसू थे। |
पीड़ित परिवार के प्रत्यक्ष बयान
आश्रम से ₹5 लाख की नकद राशि और पूर्ण इलाज का आश्वासन लेकर बाहर निकले माता-पिता, मौसी और मामा अपने आंसू नहीं रोक पाए। उन्होंने अपनी स्थिति इन शब्दों में बयां की:
- “मेरी बच्ची को बिलियरी एट्रेसिया है। पीजीआई का ऑपरेशन सफल नहीं हुआ और अब बच्ची के पास समय नहीं है। मेदांता में 18 लाख का एस्टीमेट है। हमने हर जगह फरियाद लगाई, किसी ने नहीं सुनी। लेकिन गुरुजी को जैसे ही एस्टीमेट बताया, उन्होंने एक सेकंड में ₹5 लाख हाथ में दे दिए और कहा कि ‘सारा खर्चा मैं उठाऊंगा, पैसों की वजह से बच्ची को मरने नहीं देंगे।’ सच में धरती पर यही भगवान हैं।” — श्वेता और राकेश (बच्ची के माता-पिता)
- “मेरे जीजा चार महीने से काम नहीं कर पा रहे हैं और मैं खुद अपनी नौकरी छोड़कर लोगों के सामने भीख मांग रहा था कि किसी तरह इस बच्ची को बचा लूं। हमने पहले कभी परमात्मा को नहीं देखा था, लेकिन आज साक्षात देखा है। इन्होंने एक सेकंड में हमारे दुख को समझा और बिना किसी देरी के हमारी बच्ची को जीवनदान दिया।” — अभिषेक (बच्ची के मामा)
- “मेरी बहन और जीजू सबके सामने हाथ फैला रहे थे, क्योंकि 18 लाख की मोटी रकम कोई नहीं दे सकता था। हमने यहां नाम दीक्षा भी नहीं ले रखी है, फिर भी इस दरबार से हम खाली हाथ नहीं लौटे। जो लोग इनके खिलाफ बोलते हैं, अगर वे किसी की मदद नहीं कर सकते तो उन्हें अपना मुंह बंद रखना चाहिए।” — प्रियंका (बच्ची की मौसी)
परोपकार केवल उपदेशों में नहीं
जब किसी गरीब परिवार के सामने ₹18 लाख जैसी विशाल राशि के अभाव में अपनी संतान को खोने का संकट खड़ा हो, तब बिना किसी कागजी देरी या यह देखे बिना कि व्यक्ति उनका शिष्य है या नहीं, एक ही पल में ₹5 लाख नकद देना और पूरे इलाज का भार उठाना, मानवता की सर्वोच्च मिसाल है।
यह घटना दर्शाती है कि संत रामपालजी महाराज परोपकार केवल उपदेशों में नहीं, बल्कि जीवन-मरण के संकट से जूझ रहे असहाय लोगों को तत्काल जीवनदान देने के रूप में धरातल पर कर रहे हैं।



