Maghar Story in Hindi: कबीर परमेश्वर का सशरीर मगहर (Maghar) से सतलोक गमन

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Last Updated on 27 June 2022, 7:48 PM IST | Maghar Story in Hindi: कबीर साहेब जी 120 वर्ष काशी में रहे और अंत समय में उन्होंने मगहर (Maghar) से सशरीर सतलोक गमन किया। ऐसा करने के तमाम कारणों के बारे में आइए विस्तार से जानते हैं।

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मगहर कहां है?

मगहर उत्तर प्रदेश राज्य के संत कबीर नगर जिले में एक कस्बा और नगर पंचायत है। प्राचीन काल में यह जगह निर्जन और वन से ढकी थी। इस इलाके के आस-पास रहने वाले गिने चुने लोगों और भिक्षुओं के साथ लूटपाट की घटनाएं होती रहती थीं, इसीलिए इस रास्ते का ही नाम मार्गहर यानी मार्ग में हरना (लूटना) अर्थात मगहर (Maghar) पड़ गया। परंतु मौलवी ख़ादिम अंसारी के अनुसार मार्गहर नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां से गुज़रने वाला व्यक्ति हरि यानी भगवान के पास ही जाता है। इस प्रकार इसके नाम को लेकर कई धारणाएं प्रचलित हैं।

मगहर स्थान को अपवित्र क्यों माना जाता था?

एक अन्य धारणा के अन्तर्गत मगहर स्थान को एक अपवित्र स्थान माना जाता था। इस स्थान के बारे में ये मान्यता थी कि जिस किसी व्यक्ति की मृत्यु यहां होती है, वह नरक में जाता है। असलियत में यह धारणा पूर्वी ईरान से आए माघी ब्राह्मणों द्वारा गढ़ दी गई थी। दूसरी ओर वैदिक ब्राह्मण जो इनको तनिक महत्व नहीं देते थे और जिस कारण इनके निवास स्थान को भी नीचा करके दिखाया गया। इसी कारण सब जगह मगहर (Maghar) को लेकर ये भ्रांति और डर फैला दिया गया कि कोई भी अंतिम समय में मगहर में ना रहकर काशी चला जाए क्योंकि वो सर्वोपरि स्थान है और उस जगह प्राण त्यागने से स्वर्ग प्राप्ति होती है।

कबीर साहेब जी कौन थे?

कबीर जी को लेकर कई दंत कथाएं प्रचलित हैं। उनको 15वीं शताब्दी में महान संत तथा कवि के रूप में जाना जाता है। वास्तव में वे पूर्ण परमात्मा थे। उन्होंने बहुत पढ़े-लिखे नहीं होने का अभिनय किया। परंतु उनको वेदों का पूर्ण ज्ञान था। उनका व्यक्तित्व तथा वेशभूषा बहुत ही साधारण थी तथा उन्होंने जातिवाद, पाखण्डवाद का पुऱजोर खंडन किया।

कबीर साहेब का प्राकट्य

कबीर जी सन् 1398 (विक्रमी संवत् 1455) ज्येष्ठ मास सुदी पूर्णमासी को ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) में काशी में आए थे। परंतु कबीर साहेब ने मां के गर्भ से जन्म नहीं लिया अपितु वे अपने निजधाम सतलोक से सशरीर आकर बालक रूप बनाकर लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए। इस दिन (कबीर प्रकट दिवस) को कबीर साहेब के जन्मदिन के उपलक्ष्य में कबीर पंथी हर साल जून के महीने में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।

गरीब, अनंत कोटि ब्रह्मांड में, बन्दी छोड़ कहाय।

सो तौ एक कबीर हैं, जननी जन्या न माय।।

मगहर (Maghar) स्थान का कबीर जी से क्या संबंध है?

कबीर साहेब पूर्ण परमात्मा है जो हर युग में आते रहे हैं जिसकी गवाही हमारे धर्म ग्रंथ भी देते हैं। उनका मगहर से गहरा नाता है। उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड, मूर्ति पूजा, छुआछूत तथा हिंसा का विरोध किया। साथ ही हिन्दू -मुस्लिम में भेदभाव का पुरजो़र खंडन किया। इसी तरह इस अंधविश्वास को मिटाने के लिए कि आखिरी समय में मगहर (Maghar) में प्राण त्यागने वाला नरक जाएगा, अपने अंत समय में काशी से चलकर मगहर आए। जिसके बाद सबकी धारणा बदल गई।

कबीर साहेब जी का जीवन परिचय

कबीर जी के जन्म को लेकर भी समाज में कई धारणाएं व्याप्त हैं। कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने नीरू नीमा के घर जन्म लिया। अन्य का मत है कि नीरू नीमा को कबीर साहेब शिशु रूप में लहरतारा तालाब पर मिले जो कि बिलकुल सत्य है। इसका वर्णन कबीर साहेब ने अपनी एक वाणी में नीरू को आकाशवाणी के माध्यम से स्पष्ट किया जब वह नीमा के साथ कबीर जी को घर ना ले जाने के लिए विरोध कर रहे थे जो इस प्रकार है:-

द्वापर युग में तुम बालमिक जाती, भक्ति शिव की करि दिन राती।

तुमरा एक बालक प्यारा, वह था परम शिष्य हमारा।

सुपच भक्त मम प्राण प्यारा, उससे था एक वचन हमारा।

ता कारण हम चल आए, जल पर प्रकट हम नारायण कहाऐ।

लै चलो तुम घर अपने, कोई अकाज होये नहीं सपने।

बाचा बन्ध जा कारण यहाँ आए, काल कष्ट तुम्हरा मिट जाए।

इतना सुनि कर जुलहा घबराया, कोई जिन्द या ओपरा पराया।

मोकूँ कोई शाप न लग जाए, ले बालक को घर कूँ आए।।

उपरोक्त वाणी में कबीर साहेब ने नीरू को स्पष्ट किया कि द्वापर युग में आप सुदर्शन के माता-पिता थे जिसको मैंने वचन दिया था कि मैं तेरे माता-पिता का कल्याण अवश्य करूँगा इसलिए आप मुझे अपने घर ले चलो, आपको कोई आपत्ति नहीं होगी।

कबीर साहेब जी के माता पिता कौन थे?

कबीर साहेब जी ने स्वयं अपनी वाणियों में यह स्पष्ट कर दिया है कि उनके कोई माता पिता नहीं थे। न ही उन्होंने मां के गर्भ से जन्म लिया तथा वे अजर अमर अर्थात अविनाशी हैं। कबीर जी कहते हैं:-

अवधू, अविगत से चले आए, कोई मेरा भेद मरम नहीं पाया ।

ना मेरा जन्म ना गर्भ बसेरा, बालक बन दिखलाया ।

काशी नगर जल कमल पर डेरा, वहां जुलाहे ने पाया ।

मात पिता मेरे कछु नाही, न मेरे घर दासी ।

जुलहे का सुत आन कहाया, जगत करे मेरी हासी ।

पांच तत्वों का धड़ नहीं मेरा, जानुं ज्ञान अपारा ।

सत्य स्वरूपी नाम साहेब, सोई नाम हमारा ।

अधर दीप गगन गुफा में, तहां निज वस्तु सारा ।

ज्योति स्वरूपी अलख निरंजन, वो भी धरता ध्यान हमारा ।

हाड़, चाम, लहु नहीं मेरे, कोई जाने सत्य नाम उपासी ।

तारन तरन अभय पद दाता, मैं हूं कबीर अविनाशी ।।

कबीर साहेब किस प्रकार पूर्ण परमात्मा है?

15 वीं शताब्दी में स्वामी रामानंद जी का बहुत बोलबाला था। वह 104 वर्ष के थे। उस समय स्वामी अष्टानंद जी ने आदरणीय रामानंद जी से दीक्षा ले रखी थी तथा प्रतिदिन लहरतारा तालाब पर बैठकर अपने गुरुदेव द्वारा दी साधना किया करते थे। जब कबीर साहेब कमल के फूल पर अवतरित हुए तो उनको (स्वामी अष्टानंद जी) एक बहुत तेज प्रकाश दिखा जिससे उनकी आँखे चौंधिया गईं तथा वह कुछ समझ ना पाए कि ये क्या था।

इस प्रश्न के समाधान हेतु वो अपने गुरुदेव के पास गए और सारा वृतांत बताया कि आज उन्होंने ऐसी रोशनी देखी है जो कि ज़िन्दगी में कभी नहीं देखी और मेरी आँखें उस रोशनी को सहन नहीं कर सकी इसलिए बन्द हो गईं, फिर बंद आँखों में एक शिशु का रूप दिखाई दिया। इस पर स्वामी रामानन्द जी ने कहा कि पुत्र, ऐसा तभी होता है जब ऊपर के लोकों से कोई अवतार आते हैं। वे किसी के यहां प्रकट होंगे, किसी माँ से जन्म लेंगे और फिर लीला करेंगे। (क्योंकि इन ऋषियों को इतना ही ज्ञान है कि अवतार का जन्म माँ से ही होता है) जितना ऋषि को ज्ञान था उस अनुसार अपने शिष्य का शंका समाधान कर दिया।

कबीर साहेब जी का कमल के फूल पर प्रकट होना

जब कबीर साहेब कमल के फूल पर अवतरित हुए तो लहरतारा तालाब जगमग हो उठा। परमेश्वर कबीर जी सन् 1398 (विक्रमी संवत् 1455) में काशी नगरी में लहर तारा नामक सरोवर में कमल के फूल पर जल के ऊपर शिशु रूप में प्रकट हुए थे। वहां स्नान करने आए जुलाहा दंपति नीरू नीमा उन्हें अपने साथ घर ले आए। उसके बाद कबीर जी की परवरिश कुंवारी गाय के दूध से हुई।

यही हमारे पुराणों तथा धर्म ग्रंथो में वर्णित है कि पूर्ण परमात्मा मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता तथा उसकी परवरिश कुंवारी गाय के दूध से होती है। ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 1 मंत्र 9 में वर्णन है कि जिस समय अमर पुरुष शिशु रूप में पृथ्वी के ऊपर प्रकट होते हैं तो उनका पोषण कंवारी गायों द्वारा होता है।

अभी इमं अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम् सोममिन्द्राय पातवे।

अभी इमम्-अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम् सोमम् इन्द्राय पातवे।।

ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17 में वर्णन है कि पूर्ण परमात्मा एक बच्चे के रूप में प्रकट होकर अपने वास्तविक ज्ञान को अपनी कबीर वाणी के द्वारा अपनी हंसात्माओं अर्थात् अनुयायियों को ऋषि, संत व कवि रूप में कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा सम्बोधन करके अर्थात उच्चारण करके वर्णन करता है।

शिशुम् जज्ञानम् हर्य तम् मृजन्ति शुम्भन्ति वहिन मरूतः गणेन।

कविर्गीर्भि काव्येना कविर् संत् सोमः पवित्रम् अत्येति रेभन्।।

उपरोक्त तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि कबीर जुलाहा ही वह पूर्ण परमात्मा है जिनकी महिमा वेदों में लिखी है और वह परमेश्वर कबीर जी के ऊपर खरी भी उतरती है।

Maghar Story in Hindi: कबीर जी काशी से मगहर कब और क्यों गए?

कबीर साहिब जी ताउम्र काशी में रहे। परंतु 120 वर्ष की आयु में काशी से अपने अनुयायियों के साथ मगहर के लिए चल पड़े। 120 वर्ष के होते हुए भी उन्होंने 3 दिन में काशी से मगहर का सफर तय कर लिया। उन दिनों काशी के कर्मकांडी पंडितों ने यह धारणा फैला रखी थी कि जो मगहर में मरेगा वह गधा बनेगा और जो काशी में मरेगा वह सीधा स्वर्ग जाएगा।

काशी में करौंत की स्थापना की कथा

आज से 600 वर्ष पहले काशी में धर्मगुरुओं द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिए गंगा दरिया के किनारे एकांत स्थान पर एक नया घाट बनाया गया और वहां पर एक करौंत लगाई। धर्मगुरूओं ने एक योजना बनाई कि भगवान शिव का आदेश हुआ है कि जो काशी नगर में प्राण त्यागेगा, उसके लिए स्वर्ग का द्वार खुल जाएगा। वह बिना रोक-टोक के स्वर्ग चला जाएगा। जो शीघ्र ही स्वर्ग जाना चाहता है, वह करौंत से मुक्ति ले सकता है। उसकी दक्षिणा भी बता दी।

जो मगहर नगर (गोरखपुर के पास उत्तरप्रदेश में) वर्तमान में जिला-संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) में है, उसमें मरेगा, वह नरक जाएगा या गधे का शरीर प्राप्त करेगा। गुरूजनों की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अनुयाईयों का परम धर्म माना गया है। इसलिए हिन्दु लोग अपने-अपने माता-पिता को आयु के अंतिम समय में काशी (बनारस) शहर में किराए पर मकान लेकर छोड़ने लगे। अपनी जिंदगी से परेशान वृद्ध व्यक्ति अपने पुत्रों से कह देते थे एक दिन तो भगवान के घर जाना ही है हमारा उद्धार शीघ्र करवा दो।

इस प्रकार धर्मगुरुओं द्वारा शास्त्रों के विरुद्ध विधि बता कर मोक्ष के नाम पर काशी में करौंत से हजारों व्यक्तियों को मृत्यु के घाट उतारा जाने लगा। शास्त्रों में लिखी भक्ति विधि अनुसार साधना न करने से गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि उस साधक को न तो सुख की प्राप्ति होती है, न भक्ति की शक्ति (सिद्धि) प्राप्त होती है, न उसकी गति (मुक्ति) होती है अर्थात् व्यर्थ प्रयत्न है।

इस गलत धारणा को कबीर परमेश्वर लोगों के दिमाग से निकालना चाहते थे। वह लोगों को बताना चाहते थे कि धरती के भरोसे ना रहें क्योंकि मथुरा में रहने से भी कृष्ण जी की मुक्ति नहीं हुई। उसी धरती पर कंस जैसे राजा भी डावांडोल रहे।

मुक्ति खेत मथुरा पूरी और किन्हा कृष्ण कलोल,

और कंस केस चानौर से वहां फिरते डावांडोल।

इसी प्रकार हर किसी को अपने कर्मों के आधार पर स्वर्ग या नरक मिलता है चाहे वह कहीं भी रहे। अच्छे कर्म करने वाला स्वर्ग प्राप्त करता है और बुरे, नीच काम करने वाला नरक भोगता है, चाहे वह कहीं भी प्राण त्यागे, वह दुर्गति को ही प्राप्त होगा।

दोनों राजा अपनी-अपनी सेना के साथ मगहर (Maghar) क्यों पहुंचे?

उस समय काशी का हिंदू राजा बीर सिंह बघेल और मगहर (Maghar) रियासत का मुस्लिम नवाब बिजली खाँ पठान दोनों ही कबीर साहेब के प्रिय हंस (शिष्य) थे। बिजली खाँ पठान ने कबीर साहिब से नाम उपदेश लेकर अपने राज्य में मांस मिट्टी तक खाना बंद करवा दिया था। इसी प्रकार बीर सिंह बघेल कबीर साहिब की हर बात को मानता था।

जब कबीर साहेब जी काशी से मगहर (Maghar) के लिए रवाना हुए तो बीर सिंह बघेल अपनी सेना के साथ चल पड़ा। उसने निश्चय किया कि कबीर परमेश्वर के शरीर छोड़ने के पश्चात उनके शरीर को काशी लाएंगे तथा हिंदु रीति से उनका अंतिम संस्कार करेंगे। अगर मुसलमान नहीं माने तो युद्ध करके उनके मृत शरीर को लेकर आएंगे।

■ यह भी पढें: पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी चारो युगों में आते हैं

दूसरी तरफ जब बिजली खाँ पठान को सूचना मिली कि परमेश्वर कबीर जी अपनी जीवन लीला अंत करने आ रहे हैं तो उसने कबीर जी के आने की पूरी व्यवस्था की। साथ में सेना भी तैयार कर ली कि हम अपने पीर कबीर साहेब के शव को नहीं ले जाने देंगे और मुसलमान रीति से उनका अंतिम संस्कार करेंगे।

पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा शिव जी से श्रापित सूखी “आमी नदी” को फिर से बहाना

मगहर पहुंचने पर कबीर साहिब जी ने बिजली खाँ पठान से कहा कि , “मैं स्नान करूंगा”। इस पर बिजली खाँ पठान ने कहा “आपके लिए स्वच्छ जल ला रखा है गुरूवर”, परंतु कबीर जी ने कहा कि मैं बहते पानी (दरिया) में स्नान करूंगा।

बिजली खाँ पठान ने कहां कि हम आपके लिए तो स्नान करने के लिए स्वच्छ पानी लाए है। लेकिन आपके साथ आए लोगो के लिए सिर्फ पीने के पानी की व्यवस्था हो पाई। बिजली खाँ पठान ने बताया कि यहां पास ही ‘आमी नदी’ है जो भगवान शिव के श्राप से सूखी पड़ी है। परमेश्वर कबीर जी ने नदी की ओर चलने का इशारा किया और नदी में पानी पूरे वेग से बहने लगा। वहां पर खड़े सब लोगों ने “सतगुरु देव की जय के जयकारे” लगाने शुरू कर दिए। कबीर साहेब ने वहां सभी लोगो के साथ बहते पानी में स्नान किया। आज भी मगहर (Maghar) में वह आमी नदी बहती है।  

समर्थ भगवान कबीर साहेब जी ने टाला महाभारत से भी भयंकर युद्ध

परमेश्वर कबीर साहब ने दो चादर मंगवाई और आदेश दिया कि एक चादर नीचे बिछाओ और दूसरी चादर साथ में रख दो। उसे मैं अपने ऊपर ओढुंगा।

परमेश्वर कबीर साहब ने बिजली खाँ पठान और बीर सिंह बघेल से पूछा, आप दोनों यहाँ अपनी अपनी सेनाएं क्यों लेकर आए हैं? इस पर दोनों शर्मसार हो गए और गर्दन नीची कर ली। जो कबीर साहब के अन्य दीक्षित भक्त थे उन्होनें कहा कि हम आपके शरीर छोड़ने के बाद आपके शरीर का अंतिम संस्कार हमारे धर्म के अनुसार करेंगे चाहे इसके लिए हमें लड़ाई ही क्यों ना करनी पड़े।

इस पर परमेश्वर कबीर साहिब ने सबको डांटते हुए बोला कि इतने दिनों में तुमको मैंने यहीं शिक्षा दी है। साथ ही समझाया कि दफनाने और जलाने में कोई अंतर नहीं है। मरने के बाद ये शरीर मिट्टी है जो मिट्टी में ही मिल जाएगा। परमेश्वर कबीर साहिब ने सबको आदेश दिया कि इन दो चादरों के बीच जो मिले उसको दोनों आधा-आधा बांट लेना और मेरे जाने के बाद कोई किसी से लड़ाई नहीं करेगा। सब चुप थे पर मन ही मन सब ने सोच रखा था कि एक बार परमेश्वर जी को अंतिम यात्रा पर विदा हो जाने दो फिर वही करेंगे जो हम चाहेंगे। लेकिन कबीर साहेब जी तो अंतर्यामी और जानी जान थे। उन्होंने एक चादर नीचे बिछाई जिस पर कुछ फूल भी बिछाए गए। परमेश्वर चादर पर लेट गए। दूसरी चादर ऊपर ओढ़ी और सन 1518 में परमेश्वर कबीर साहिब सशरीर सतलोक गमन कर गए। यह लीला करके समर्थ परमेश्वर कबीर साहेब जी ने महाभारत से भी भयंकर युद्ध को होने से टाल दिया। उस समय के ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी कर रखी थी कि महाभारत से भी भयंकर नर संहार होगा जिसे समर्थ परमात्मा ने अपनी अनोखी लीला से टाल दिया।

कबीर साहेब का स:शरीर प्रस्थान–—शरीर की जगह मिले थे सुगंधित फूल

थोड़ी देर बाद आकाशवाणी हुई:

“उठा लो पर्दा, इसमें नहीं है मुर्दा”

वैसा ही हुआ कबीर परमात्मा का शरीर नहीं बल्कि वहां सुगन्धित फूल मिले, जिसको दोनों राजाओं ने आधा आधा बांट लिया। दोनों धर्मों के लोग आपस में गले लग कर खूब रोए। परमात्मा कबीर जी ने इस लीला से दोनों धर्मों का वैरभाव समाप्त किया। मगहर (Maghar) में आज भी हिंदू मुस्लिम धर्म के लोग प्रेम से रहते हैं।

इस पर परमात्मा कबीर जी ने अपनी वाणी में भी लिखा है:-

सत् कबीर नहीं नर देही,  जारै जरत ना गाड़े गड़ही।

पठयो दूत पुनि जहाँ पठाना, सुनिके खान अचंभौ माना।

दोई दल आई सलाहा अजबही, बने गुरु नहीं भेंटे तबही।

दोनों देख तबै पछतावा, ऐसे गुरु चिन्ह नहीं पावा।

दोऊ दीन कीन्ह बड़ शोगा, चकित भए सबै पुनि लोंगा।

वर्तमान में मगहर में कबीर साहेब से सम्बन्धित क्या-क्या है?

वर्तमान समय में मगहर (Maghar) में कबीर जी की याद में मुस्लिम लोगों ने मज़ार और हिंदुओं ने समाधि बनाई हुई है जिसमें मात्र सौ फीट की दूरी का अंतर है। समाधि के भवन की दीवारों पर कबीर साहेब जी के दोहे उकेरे गए हैं। इस समाधि के पास ही एक मंदिर भी है। इसके इलावा कुछ फूल लाकर एक चौरा (चबूतरा) जहां बैठकर कबीर साहेब सत्संग किया करते थे वहां काशी-चौरा नाम से यादगार बनाई गई है जहां अब बहुत बड़ा आश्रम है।

कबीर जी की याद में बने मंदिर तथा मस्जिद एक बहुत बड़े उदाहरण हैं। आज भी यहां के हिंदू तथा मुस्लिम एक दूसरे के साथ बहुत प्रेम से रहते हैं तथा कबीर जी के बताए मार्ग पर चलते हैं।

कौन है पूर्ण अधिकारी संत?

आज के समय में संत रामपाल जी महाराज जी ही कबीर जी द्वारा बताई हुई सत्य साधना हमारे धर्म ग्रंथों से प्रमाणित करके बताते हैं। संत रामपाल जी महाराज ने कलयुग में कबीर जी को परमेश्वर सिद्ध कर दिया है। हमारे सभी धर्म ग्रंथ भी इसकी गवाही देते हैं कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी ही हैं जिनकी भक्ति करने से मोक्ष प्राप्ति संभव है। इसलिए अपना और समय व्यर्थ ना गवांकर संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा प्राप्त करें तथा अपना कल्याण करवाएं।

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