सच्ची मजदूरी

दुनिया के सात अजूबे जिसमें चाहे चीन की दीवार हो या फिर ताजमहल सभी में एक ही किरदार शामिल है वह है मजदूर। इन्हीं मजदूरों के कभी हाथ काटे गए तो कभी जानें चली गई। विकसित देशों की बात करें तो वह भी कभी विकासशील थे और इन्हीं विकासशील देशों को विकसित करने में सबसे बड़ा हाथ श्रमिकों का ही रहा है। सूई हो या बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतें, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी हो या स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी सभी को मजदूरों ने ही तराशा है।
इन्हीं मजदूर भाई व बहनों की आवाज बुलंद करने के लिए अमेरिका में श्रमिक यूनियनों द्वारा 1 मई 1886 को मजदूरों से 8 घंटे से ज्यादा काम ना लेने के लिए हड़ताल की गई। इस हड़ताल में पुलिस ने गोली मारकर 7 श्रमिकों की हत्या भी कर दी थी। हमारे 7 मजदूरों के बलिदान और लंबे संघर्ष के बाद अमेरिकी सरकार को यह बात माननी पड़ी और आज भारत और बहुत से देशों में श्रमिक समय के 8 घंटे के होने से संबंधित कानून है।
तब से ही 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस, अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस, May Day, मई दिवस, लेबर डे और मजदूर दिवस के नाम से जाना जाता है। कुछ देशों एवं भारत के कुछ राज्यों में तो 1 मई को सरकारी अवकाश भी घोषित किया जाता है। वास्तव में यह अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस सभी देशों और धर्मों को एक प्लेटफार्म पर लाकर एक कर देता है। इस प्लेटफार्म पर आकर धर्म और राजनीति का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता और यह मानवता की एकता का दिवस है।
आज चाहे कोई भी किसी भी प्रोफेशन में है चाहे टेक्निकल में या पैरामेडिकल में, सभी श्रमिक ही हैं। सच्चाई तो यह है कि एक मजदूर का कोई धर्म और देश नहीं होता। मजदूर सिर्फ़ और सिर्फ़ मजदूर होता है।

मजबूरी में मजदूरी

कौन नहीं चाहता कि घर बैठे सारी इच्छाएं पूरी हो जाएं, कोई भी काम ना करना पड़े। लेकिन इस लोक का नियम है कि कर्म तो करना ही पड़ेगा चाहे हँस के करो या रो कर। हर एक मजदूर यह बात जरूर सोचता है कि हमने ऐसा क्या किया है पिछले जन्म में कि अब बिल्कुल हैंड टू माउथ हो गए। अपने परिवार के पालन पोषण के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता है सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत दो रोटी के लिए। असल में मजदूर इतना मजबूर है कि यही मजबूरी उनकी जान भी ले लेती है। भोपाल गैस कांड में भी इन्हीं मजदूर भाई बहनों की अधिकतर जान गयी क्योंकि सभी श्रमिक आस पास के गांव में ही रहते थे और आस पास के सभी गाँव में भी अधिकतर श्रमिक ही थे जो खेती के साथ कहीं ना कहीं मजदूरी करते थे। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल गैस कांड ने करीब 6 लाख लोगों को प्रभावित किया, जिसमें 17 हजार की मृत्यु हो गई और करीब 40 हजार लोगों को विकलांग बना दिया।
सच में कितना मुश्किल है एक श्रमिक होना। फिर भी अगर हम आंकड़ों की बात करें तो वर्ल्ड वाइड करीब साढ़े तीन अरब जनसंख्या लेबर क्लास से ही है और इसमें इंडिया में करीब 52.5 करोड़ के आसपास जनता लेबर क्लास से है। यह कहना गलत नहीं है कि यह लोक ही मजदूरों का है, सभी मजदूर हैं और मजबूर भी।

आत्म चिंतन

इतना तो हमारी आत्मा को आभास है कि जो लाभ हमें परमात्मा दे सकता है वो लाभ कोई फैक्ट्री या इंडस्ट्री का मालिक नहीं दे सकता। बल्कि राजा हो या महाराजा सभी दुखी हैं क्योंकि इस लोक में बिना कर्म किए तो कुछ मिलता ही नहीं, आज जो राजा है वो अगले जन्म में रंक भी हो सकता है।
सभी लोग अपने हाथ फैलाए, ऊपर की ओर देखते रहते हैं कि कुछ राहत मिले, सभी अपने अपने धर्मों की बताई क्रियाएँ भी कर रहे हैं फिर भी परमात्मा मदद क्यो नहीं करता? सच में यहां का भगवान कितना निष्ठुर है जो किसी की नहीं सुनता। सभी धर्म यही कहते हैं कि वह परमात्मा, खुदा, रब, अल्लाह एक है तो उसके पाने का रास्ता भी एक ही है और वह रास्ता हमारे सभी ग्रंथों में लिखा हुआ है। लेकिन हमारे धर्मगुरु उसको ना तो समझ सके और ना हमको बता पा रहे हैं। ये नकली धर्म गुरु यह नहीं बता पा रहे हैं कि उस परमात्मा का नाम क्या है? वह कौन है? कहां रहता है? क्या लीला करता है? और हमारे दुख कैसे दूर हो सकते हैं? हमारी जन्‍म मृत्यु क्यों होती है?
क्या हमारी धार्मिक क्रियाएं ठीक नहीं हैं? या फिर जिसको हम परमेश्वर मान कर पूज रहे हैं कहीं वो भगवान हो ही ना? या फिर भगवान नाम की कोई चीज़ ही ना हो।
ऐसे प्रश्‍न हमारे ज़हन में उठने लाज़मी हैं और हम नास्तिकता के कगार पर आ ही गए थे कि एक महान संत जी ने आध्यात्मिकता के ऐसे राज़ खोले कि पूरे विश्व को सोचने पर मजबूर और सभी धर्मगुरुओं को नतमस्तक कर दिया। इन संत जी ने सभी धर्मों के सभी शास्त्रों से सिद्ध कर दिया कि हम जिसको वास्तव में पूज रहे हैं वह काल का जाल है। हिंदू और सिख धर्म में इसको काल निरंजन, ज्योति निरंजन या अलख निरंजन कहा गया है और मुस्लिम और क्रिश्चियन धर्म में इसी को शैतान कहा गया है और इसी काल ब्रह्म ने हमें अलग-अलग धर्मों में बांटा है ताकि हम सब आपस में लड़ते रहें और हम एक ना हो पाएं।

मजदूरी में मजदूरी
सतगुरु रामपाल जी महाराज जी ने ही सर्व ग्रंथों से सिद्ध किया है कि वह आदि राम, बड़ा अल्लाह, रब, करतार, पूर्ण एवं आदि सनातन परमेश्वर सिर्फ़ और सिर्फ़ कबीर भगवान है और बताया कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब चारों युगों में आते हैं और इस कलयुग में भी करीब 600 साल पहले यहां पर एक धानक, मजदूर की भूमिका निभा कर गए।
अनंत कोटि ब्रह्मांड के परमात्मा कबीर साहिब जी ने इस लोक में सशरीर आकर एक निर्धन मजदूर की भूमिका निभाई। हमें परमात्मा यह दिखाना चाहते थे कि एक मजदूर आदमी, अथाह निर्धन जिसके पास सुबह का खाना है तो शाम का नहीं, वह भी अपनी मजदूरी कर्म के साथ -साथ पूर्ण परमात्मा की सच्ची भक्ति कर सकता है। अपना काम करते करते, नाम जाप कर सकते हैं मतलब कि मजदूरी में मजदूरी (सच्ची मजदूरी) कर सकते हैं। परमात्मा की भक्ति बहुत ही सरल है। आप खाते, पीते, सोते, जागते, काम करते-करते किसी भी समय सच्ची सरकार (सच्चे परमात्मा) की मजदूरी भी कर सकते हैं।

सूक्ष्म वेद में परमात्मा ने बताया है कि:-
नाम उठत नाम बैठत, नाम सोवत जाग वे।
नाम खाते नाम पीते, नाम सेती लाग वे।।

सर्वसुख देते हैं कबीर परमात्मा

पूर्ण परमेश्वर कबीर जी ही हैं जो अंधे को आंख देते हैं, कोढ़ी को काया देते हैं और निर्धन को धन देते हैं।
पूर्ण परमात्मा की सच्ची भक्ति से हमें अपने कर्म से बहुत अधिक फल मिलता है, अकाल मृत्यु नहीं होती, भक्ति करने वाले साधक की आयु भी बड़ा देता है परमात्मा और परमात्मा वह भी देता है जो हमारे भाग्य में नहीं है और मोक्ष भी देता है। ताकि फिर से इस गंदे लोक में नहीं आना पड़ेगा।

सूक्ष्मवेद में परमात्मा ने बताया है कि :-
पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण, फिरता दाने-दाने नू।
सर्व कला सतगुरु साहिब की, हरि आए हरियाणे नू।।

पेट के लिए, अपने परिवार के पोषण के लिए चारों दिशाओं में, देशों की सीमाओं को भी लांग देते हैं। कहां कहां नहीं भटकते। पर अब हम पूर्ण परमात्मा स्वरूप सतगुरु रामपाल जी महाराज जी जो की हरियाणा, भारत में आए हैं उनकी शरण ले कर सच्चे परमात्मा की सच्ची मजदूरी (सच्ची भक्ति) करनी चाहिए। जिस से की आपका और आपके परिवार को इस लोक का भी सर्व सुख मिले एवं परलोक का भी सुख प्राप्त हो।