Bollywood ke dushprabhav

बॉलीवुड के दुष्प्रभावों ने समाज को बना दिया है अपराधों का अड्डा

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वर्तमान समय में बच्चे से लेकर बूढ़े सभी कोई सिनेमा-फिल्मी जगत में रुचि लेते है। यदि देखा जाए तो प्रत्येक घर में लोग फ़िल्म-सीरियल देखने में व्यस्त रहते हैं। मानव समाज यह भूल रहा है कि हमारा जन्म यूँ-ही समय बर्बाद करने के लिए नहीं हुआ है। इस मानव जीवन को प्राप्त करने के लिए देवी-देवता भी तरसते हैं, क्योंकि केवल मनुष्य को ही परमात्मा ने जिव्हा (जवान) दी है, जिससे बोलकर वह ईश्वर के नाम का सुमरण-जाप करके अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य पूर्ण कर सकता है। परंतु वर्तमान में सभी फिल्मी दुनिया में लिप्त हैं। बॉलीवुड की देन है कि आज कोई बहन-बेटी अपने आप को सुरक्षित नहीं समझती है। समाज में Bollywood ने ऐसा ज़हर भर दिया कि जिधर देखो उधर अश्लीलता ही अश्लीलता दिखाई देती है। 

बॉलीवुड के दुष्प्रभाव: मुख्य बिंदु

  • बॉलीवुड के दुष्प्रभाव ने देश को बना दिया है  अपराधों का घर।
  • फिल्मों में दर्शक जैसा देखते है, उसे वास्तविक मानकर वैसा ही आचरण करते है।
  • बॉलीवुड नशेड़ी व चरित्रहीन लोगों का अड्डा बनता जा रहा हैं। यह लोग कदापि मानव समाज के आदर्श नहीं हो सकते हैं ।
  • फिल्मी दुनिया में रुचि रखने वाले कर रहे हैं, पैसे की बर्बादी।
  • फिल्मों द्वारा परोसे गए अश्लीलता रूपी विष को खाकर, मानव समाज कभी भी प्रगति नहीं कर सकता।
  • सिनेमा देखने से धन और समय दोनों का दुरूपयोग होता है, दृष्टि कमजोर होती है तथा स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। सिनेमा का नशाअनुशासनहीनता और अराजकता को आश्रय देता है।
  • यदि संस्कार व संस्कृति को बचाना है, तो मानव समाज को फिल्मों को छोड़कर आध्यात्मिकता की ओर जाना पड़ेगा।
  • जहाँ एक तरफ बॉलीवुड से हो रहा विनाश, वहीं दूसरी तरफ पूर्ण संत रामपाल जी महाराज जी के सत्संग से हो रहा है समाज सुधार।
  • “अच्छे विचार सुनने वाले बच्चे संयमी होते हैं इसलिए अपने बच्चों को बचपन से सत्संग के वचन सुनाकर विचारवान तथा चरित्रवान बनाना चाहिए” ।
  • पूर्ण सतगुरु द्वारा सत्संग से हमें तत्वज्ञान तथा मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है, जिसके द्वारा हमारा मुख्य उद्देश्य पूर्ण होगा ।
  • संत रामपाल जी महाराज ने एक स्वस्थ समाज तैयार करने का बीड़ा उठाया है, उनके द्वारा सत्संग सुनकर व्यक्ति सभी प्रकार के बुरे कर्मों को त्याग कर एक नेक जिंदगी जीता है ।

क्यों समाज में फैल रही है अश्लीलता?

आज एक छोटी सी किसी चीज का प्रचार हो तो लोग उसमें भी अश्लीलता डालना चाहते हैं, ताकि वह प्रसिद्ध हो जाए और वह वस्तु बिक जाए। क्या हो गया है आज के मानव समाज को, लोगों की मानसिकता ऐसी हो चुकी है कि अब सभ्यता की कोई जगह नहीं रही है। लोगों की मानसिकता अब ऐसी है कि बस जितना अश्लील प्रदर्शन हम करेंगे उतना ही लोकप्रिय होंगे। मूवी के पोस्टर भी अश्लीलता से भरा हुए बनाकर बीच चौराहे पर लगाये जाते हैं, जिन रास्तों से छोटे-छोटे बच्चे स्कूल के लिए जाते हैं वो इन बकवाद से क्या सीख लेंगे? आज बच्चो को मोबाइल में जाने अनजाने में ऐसी अश्लील चीजे दिख जाती है जब वे अपने पढ़ाई संबंधी काम कर रहे होते है।

वर्तमान में मानव समाज कर रहा है फिल्मी दुनिया की नकल

जैसा फिल्म में घटता है, दर्शक उसे देखकर वास्तविकता मान बैठते है फिर उसी के अनुरूप आचरण करते है। आप देख रहे है कि बढ़ता हुआ फैशन इसका ज्वलंत उदाहरण है। कल जिस फिल्म में जो नया फैशन आया है वह आज युवक-युवतियों में दृष्टिपात होने लगता है। बॉलीवुड ने अश्लीलता की हद पार करदी हैं क्योंकि इसमें अभिनेता अभिनेत्री इतना घटिया पहनावा पहनते है कि हम अंतर नहीं कर पाते है वस्त्र पहन भी रखे हैं या नहीं, इसको जब मानव समाज देखता है फिर उसके मन में भी उसी तरह के विचार उत्पन्न होने लगते हैं। यह सब देख कर फिर उसी तरह के आचार-विचार, पहनावा, रहन-सहन करने लगा है मानव समाज।

आजकल के बच्चे भी अब फिल्मी दुनिया को ही पसंद करते हैं। बालों की कटिंग, बोलने का तरीका सब कुछ उलट-पुलट है वर्तमान के युवा समाज बड़ों का आदर तो दूर रहा, बोलने का तरीका भी भूलता जा रहा है। यदि हम फिल्मी दुनिया को बढ़ावा देंगे तो फिर हमारा जीवन दुःखमयी ही होना है। जो बच्चे फिल्मी दुनिया मे रुचि रखते हैं फिर उसी की नकल करते हैं। ऐसे बच्चे माँ-बाप का आदर और सेवा कर सकते हैं क्या ? बिल्कुल नहीं।

बॉलीवुड नशेड़ी व चरित्रहीन लोगों का अड्डा बन गया है!

फिल्मों में ज्यादातर नशा करते हुए व चरित्रहीन दृश्य दर्शाए जाते हैं। जिनको दर्शक देखकर फिर खुद भी उसी तरह नशे में लिप्त हो जाता है। सोचने वाली बात है कि बॉलीवुड ने नशे को फैशन की तरह फेमस कर दिया है। आजकल का युवा समाज नशा करना फैशन समझता है। नशा करने वालो ने अपने घरों को बर्बाद कर दिया है। घर का सुख चैन छीन लिया है। फिर भी हम ऐसी गलत प्रभाव डालने वाली फिल्मी दुनिया को ही बढ़ावा देते है। बॉलीवुड में काम करने वालो ने तो अपने चरित्र को बेचकर पैसा कमाने का कार्य करना शुरू किया है। मानव समाज अपना पैसा इन तुच्छ लोगों द्वारा बनाई फ़िल्मों को देखकर बर्बाद कर रहा है। दिन-प्रतिदिन चरित्रहीन बनता जा रहा है। लोग यह भूल रहे हैैं कि यह नशा हमारा नाश कर देगा, हमारे जीवन का सुख-चैन छीन लेगा। हम क्यों भूल रहे हैं कि हमारा चरित्र बर्बाद हो रहा है। अपनी मॉडर्न छवि बनाने वालों क्यों जीवन में दुःखों के पहाड़ गिराने के उपाय अपना रहे हो? क्यों फिल्मों में देखकर नशे के फैशन में जीवन बर्बाद कर रहे हो? यह बॉलीवुड पैसे के लिए यह सब कर रहा है। पर आपके तो पैसे भी जाते हैं, साथ में आप बुरी आदत भी सीख जाते हो। 

समझदार को संकेत काफी है कि हम केवल हमारा समय बर्बाद कर रहे हैं। फिल्मों द्वारा परोसे गए अश्लीलता रूपी विष को खाकर, मानव समाज कभी भी प्रगति नहीं कर सकता है। जो बॉलीवुड को ही सबकुछ मानते हैं, उसको ही देखना पसंद करते हैं वह समाज के लिए कुछ करने की सोच ही नहीं सकते हैं क्योंकि उनके दिमाग में पहले से ही अश्लीलता रूपी विष घुलकर अच्छे विचार सोचने की क्षमता नष्ट हो चुकी हैं। यदि मनुष्य समाज के लिए कुछ करना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है और अपने जीवन को सफल बनाना चाहता है तो उसे फिल्मी दुनिया से दूरी रखनी पड़ेगी।

बॉलीवुड (फिल्मी दुनिया) के दुष्प्रभाव निम्न है

  1. बॉलीवुड में रुचि रखने वाले व्यक्ति के मन में शांति व सहनशीलता कम हो जाती है।
  2. जो व्यक्ति फ़िल्म देखने में अपना समय बर्बाद करता है, वह जीवन में समाज के लिए अच्छा कभी कर ही नहीं सकता है।
  3. बॉलीवुड की नकल करने वाले कभी भी बहन-बेटियों की इज्जत नहीं कर सकते हैं।
  4. बॉलीवुड ही कारण है कि आज युवा समाज नशे में लिप्त है। नशे को युवा समाज ने फैशन का नाम दिया है।
  5. बॉलीवुड में लिप्त व्यक्ति चरित्रहीन, कुलहीन, अशान्तिपूर्ण व निर्लज्ज बन जाता है ।
  6. बॉलीवुड ही कारण है कि आज के छोटे बच्चों ने भी फिल्मी हीरो-हीरोइन जैसा बनने की ठान रखी है जिसके फलस्वरूप वह अंत में प्रगतिशील न बनकर प्रगतिहीन हो जाते हैं।
  7. सिनेमा देखने से धन और समय के दुरूपयोग होता है, दृष्टि कमजोर होती है तथा स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।
  8. सिनेमा का नशा अनुशासनहीनता और अराजकता को आश्रय देता है।
  9. फिल्मों से समाज बिगड़ा है उससे घटिया फैशन, अपराध, समाज विरुद्ध आचरण, चोरी डकैती, दुष्कर्म व बलात्कार जैसे आचरण पनप कर युवक-युवतियां बर्बाद हो रहे हैं। 

संस्कार व संस्कृति को बचाने में केवल आध्यत्मिक मार्ग ही मदद कर सकता है

वर्तमान में मानव समाज इतना निर्लज्ज हो गया है कि माँ-बाप, बड़े-बूढ़े किसी की इज्जत नहीं है। केवल फिल्मी दुनिया की तरह आचरण करना है। अपने संस्कार व संस्कृति को भूल कर चरित्रहीन बनता जा रहा है आज का युवा समाज। पहले के जमाने में लोग शादी-विवाह में नाचने-गाने वाली औरतों को लाते थे। परंतु वर्तमान में इसके विपरीत देखने हो मिलता है। अपनी ही बहन-बेटियों को शादियों-पार्टियों में नचाते हैं लोग, और कहते है वह वाह क्या खूब नाच किया है। पहले तो बहन बेटियों को घर के बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। परंतु फिल्मी दुनिया की नकल करने वालों ने संस्कार व संस्कृति में आग लगा डाली है। किसी को परवाह नहीं है कि हमारे घर की इज्जत का क्या होगा, हमारे बच्चों को क्या सीख मिलेगी। 

भगवान ही हर समस्या का समाधान है!

यह मानव जीवन कब समाप्त हो जाए किसी को एक पल का भी भरोसा नहीं है। फिर क्यों हम इस नरकमयी फिल्मी दुनिया में रुचि रखते हैं। आध्यात्मिक ज्ञान ऐसा ज्ञान है जो हमारे संस्कार व संस्कृति को ऐसा मजबूत बनाएगा जो कभी कुमलाएगा नहीं। यह ऐसा निर्मल ज्ञान है जिसके फलस्वरूप हमारे चरित्र, रहन-सहन में इतनी निर्मलता आती है कि हम शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं। इस ज्ञान से हमारे अंदर सबके लिए आदर-सत्कार भाव रहता है। इस ज्ञान के अभाव से ही हम हमारे आचरण को गलत दिशा दे जाते हैं। इसलिए बॉलीवुड का नशा त्याग कर, सत्य की ओर लौटने में ही हमारा हित है।

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परमात्मा ने यह मानव जीवन केवल भक्ति करने के लिए ही प्रदान किया है। यदि हम इसके विपरीत, बॉलीवुड या अन्य दुष्प्रभाव प्रदान करने वाले मार्ग को अपनाएंगे तो हमारे मनुष्य जन्म को बार-बार धिक्कार है। यदि हम अपने समाज को अपराध रहित, सभी बुराइयों से दूर देखना चाहते हैं तो उसका एक ही विकल्प है वह है सत ज्ञान और सत्संग। सत्संग से ही समाज से बुराई का अन्त हो सकता है। समाज के बुद्धिजीवियों और सज्जन व्यक्तियों के द्वारा फिल्मों का बहिष्कार होना चाहिए।

कबीर साहेब जी कहते हैं :- 

बोली-ठोली मसखरी, हंसी-खेल हराम।

मद माया और नाचन-गावन, संतों के नहीं काम।।

इस संसार की चकाचौंध (बॉलीवुड) ब्रह्म का जाल है

यह नाशवान लोक दुःख का सागर है, यहाँ बिना सतभक्ति के जीवन बर्बाद है। जिस संसार में हम रह रहे हैं यहाँ पर कहीं पर भी सुख नजर नहीं आता और न ही है, क्योंकि यह लोक नाशवान हैं, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानवों के सूक्ष्म शरीर का नित्य आहार करता है। उसने सब प्राणियों को कर्म-भर्म व पाप-पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे मैं कैद किया हुआ है। कबीर साहेब जी कहते हैं :-

तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जल।

सभी जीव भोजन भये, एक खाने वाला काल।।

वह नहीं चाहता कि कोई प्राणी इस पिंजरे रूपी कैद से बाहर निकल जाए। वह यह भी नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने निज घर सतलोक का पता चले। इसलिए वह अपनी त्रिगुणी माया से हर जीव को भ्रमित किए हुए है। 

मानव को माया की चाहत कहाँ से उत्पन्न हुई? 

यहाँ हम सबको मरना है। सब दुःखी व अशान्त हैं। जिस स्तिथि को यहाँ हम प्राप्त करना चाहते हैं उस स्तिथि में हम अपने निज घर सतलोक में रहते थे। काल ब्रह्म के लोक में स्वेच्छा से आकर हम सब यहाँ फंस गये और अपने निज घर का रास्ता भूल गए। कबीर साहेब जी कहते है –

 “इच्छा रूपी खेलन आया, ताते सुख सागर नही पाया।।”

इस काल ब्रह्म के लोक में शांति व सुख का नामोनिशान नहीं है। त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, लाभ-हानि, मान-बड़ाई  रूपी अवगुण हर जीव को परेशान किए हुए है। हम जो सुख सुविधाएं यहां ढूंढ रहे है वे यहां है ही नही। लेकिन हमे वह सब पहले प्राप्त थी तथा माया हमारे चरणों में पड़ी रहती थी।

क्या यहां कोई सुखी है?

इस लोक में जहा हम रह रहे हैं यहाँ एक जीव दूसरे जीव को मारकर खा जाता है, शोषण करता है, इज्जत लूट लेता है, धन लूट लेता है शांति छीन लेता है। यहाँ पर चारों तरफ आग लगी है। यदि आप शांति से रहना चाहोगे तो दूसरे आपको नहीं रहने देंगे। आपके न चाहते हुए भी चोर चोरी कर ले जाता है, डाकू डाका डाल ले जाता है, दुर्घटना घट जाती है, किसान की फसल खराब हो जाती है, व्यापारियों का व्यापार ठप्प हो जाता है, राजा का राज छीन लिया जाता, स्वस्थ्य शरीर में बीमारी लग जाती है, अर्थात यहाँ पर कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं है। राजाओं के राज, इज्जतदारों की इज्ज़त, धनवान का धन ताकतवर की ताकत यहाँ तक कि हम लोगों से अपने शरीर अचानक छीन लिये जाते हैं। माता-पिता के सामने जवान बेटा, बेटी मर जाते हैं, दूध पीते बच्चों को रोते बिलखते छोड़कर माता-पिता मर जाते है, जवान बेटी विधवा हो जाती है और पहाड़ जैसे दुःखों को भोगने को मजबूर हो जाती है।

सच्चा सुख कहां है?

विचार करें कि क्या यह स्थान रहने के लायक है ? लेकिन हम मजबूरी बस यहां रह रहे हैं, क्योंकि इस काल के पिंजरे से निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता और हमें दूसरों को दुःखी करने की व दुःख सहने की आदत सी बन गई। यदि आप जी को इस लोक में होने बाले दुःखों से बचना है तो यहां के प्रभु काल से परम् शक्ति युक्त परमेश्वर (परम् अक्षर ब्रह्म) की शरण लेनी पड़ेगी। जिस परमेश्वर का डर काल प्रभु को भी है। जिस के डर से यह उपरोक्त कष्ट उस जीव को नहीं दे सकता जो पूर्ण परमात्मा अर्थात परम् अक्षर ब्रह्म (सत्य पुरुष) की शरण पूर्ण संत के बताए मार्ग  से ग्रहण करता है। वह जब तक संसार मे भक्ति करता रहेगा, उसको किसी भी प्रकार के कष्ट आजीवन नहीं होते हैं। वह परम शांति व सुख यहाँ न होकर निज घर सतलोक में है। जहां पर न जन्म है न मृत्यु हैं, न बुढापा, न दुःख, न कोई लड़ाई-झगड़ा है, न कोई बीमारी, न पैसे का कोई लेन-देन, न मनोरंजन के साधन खरीदना है। वहाँ पर सब सुविधाएं परमात्मा जी द्वारा निःशुल्क व अखण्ड है। उस धाम की प्राप्ति के लिए हमें सतगुरु की शरण में जाकर उनसे सतभक्ति (सच्चे मंत्र-भगवान के नाम) प्राप्त कर भक्ती कमाई करनी पड़ेगी।

फिल्मी दुनिया में जिसे हम सुख-शांति समझकर उसमें लिप्त हो रहे हैं, वह केवल सपने के समान है। असली सुख-शांति तो अमर लोक (सतलोक) में है। जहां हम पूर्ण संत जी द्वारा बताई गई भक्तिविधि के अनुसार जा सकते हैं। जहाँ जाने के बाद हम परम-अमर सुख को प्राप्त करते हैं।

तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी स्वस्थ समाज कर रहे हैं तैयार

वर्तमान में पूरे विश्व में एकमात्र केवल तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी ही हैं जो वास्तविक तत्वज्ञान करा कर पूर्ण परमात्मा की पूजा आराधना बताते हैं। समझदार को संकेत ही काफी होता है। वह पूर्ण परमात्मा ही है जो हमें धनवृद्धि कर सकता है, सुख शांति दे सकता है व रोग रहित कर मोक्ष दिला सकता है। बिना मोक्ष के हम काल-चक्र में ही घूमते रहेंगे, यदि इससे छुटकारा चाहिए तो एक ही उपाय है।  सर्व सुख और मोक्ष केवल तत्वदर्शी संत की शरण में जाने से सम्भव है। तो सत्य को जानें और पहचान कर तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज से नामदीक्षा लेकर अपना जीवन कल्याण करवाएं। 

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