HomeBlogsक्यों और कैसे मनाते हैं दिवाली का त्यौहार ?

क्यों और कैसे मनाते हैं दिवाली का त्यौहार ?

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दिवाली को त्यौहार रूप में कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाता है। दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस (लक्ष्मी पूजन) और दो दिन बाद भैया दूज (भाई बहन का एक-दूसरे के प्रति प्रेम प्रदर्शन) का दिन मनाया जाता है। इस वर्ष दीपावली 27 नवंबर, 2019 को मनाई जाएगी।

कार्तिक अमावस्या

राम जी इस दिन अपनी धर्मपत्नी सीता जी को बारह वर्ष रावण की कैद में रहने के बाद वापिस अयोध्या लेकर लौटे थे। लंकापति रावण ने सीता का अपहरण कर लिया था। राम जी ने हनुमान जी द्वारा संधि प्रस्ताव भेज कर सीता जी को लौटाने को कहा था परंतु दुष्ट रावण न माना। तब राम जी ने वानर सेना की मदद और मुनिंदर ऋषि जी के आशीर्वाद से रावण को युद्ध में मारकर सीता को जीता था।
सीता को अयोध्या वापस लाने से पहले राम जी ने सीता की अग्निपरीक्षा ली थी जिसमें सीता जी पास हुई थीं।
यह त्रेतायुग की बात है जब राम जी सीता जी की परीक्षा लेकर अयोध्या लौटे थे तब तक वह दोनों चौदह बरस का वनवास भोग चुके थे। अयोध्या में उनके लौटने पर खुशी की लहर दौड़ पड़ी कि अयोध्या नगरी को अब उनका नरेश वापस मिलेगा। उनके घर लौटने की खुशी में नगरी को दीपों की रोशनी में जगमगा दिया गया था।

विष्णु जी, राम रूप में श्रापवश जन्मे थे

राम विष्णु जी के अवतार थे, जो नारद जी के श्रापवश धरती पर कर्म भोगने आए थे। नारद जी के श्रापवश विष्णु जी को त्रेतायुग में एक जीवन स्त्री वियोग में गुज़ारना था जबकि द्वापरयुग में विष्णु जी कृष्ण अवतार में आए थे, उनकी सोलह हज़ार रानियां थीं।

जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने तार तार की मर्यादा।

राम और सीता का जीवन सदा दुखों से भरा रहा। पहले विवाह होते ही राज पाट छोड़ कर वनवास भोगना पड़ा। जंगल में जानवरों का भय तो था ही, ऊपर से राक्षस रावण द्वारा सीता जी का अपहरण हुआ। लक्ष्मण जी ने भी विवाहित होते हुए अपने बड़े भाई के साथ वनवास भोगना स्वेच्छा से स्वीकार किया।
राम और सीता को अभी वनवास से लौटे दो ही बरस हुए थे कि धोबी और उसकी पत्नी के घरेलू झगड़े में धोबी ने अपनी बीवी को यह ताना मारा कि ,” मैं राम जैसा नहीं हूं जो अपनी पत्नी को बारह वर्ष रावण की कैद में रहने के बाद भी घर में रखे।”
धोबी का यह व्यंग्य राम जी के हृदय को छलनी कर गया और उन्होंने निश्चय किया कि वह अब लोगों के और व्यंग्य नहीं सुनेंगे और सीता जी का त्याग कर देंगे।
इस पृथ्वी पर किसी को भी राम जी द्वारा सीता जी को घर से निकालने का दुःख नहीं। राम जी भी क्रोध, अंहकार, मोह, लोभ के जाल से मुक्त नहीं थे। वह असली मर्यादा पुरुषोत्तम होते तो भरी रात में अपनी गर्भवती स्त्री को घर से नहीं निकाल देते।
सच तो ये है कि राम तीन लोक के मालिक हैं और इनकी बुद्धि का कंट्रोल इनके पिता काल के हाथों में है। वह जब चाहे इसे On और Off कर देता है। उदाहरण के लिए, राम भगवान होते हुए भी यह न जान पाए कि सीता कहां चली गई या उसे किसी ने उठा तो नहीं लिया ? सीता को रावण की कैद से छुड़ाने में कई करोड़ सैनिक, रावण के एक लाख पुत्र और सवा लाख रिश्तेदार भी मारे गए थे।

राम जी साधक की इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकते

राम जी भगवान कहलाते ज़रूर हैं परंतु इनकी शक्तियां बहुत सीमित हैं यह मरे हुए व्यक्ति तक को जीवित नहीं कर सकते जब युद्ध के समय लक्ष्मण मूर्छित (कौमा वाली स्थिति ) अवस्था में चले गए थे तो राम जी ने बहुत विलाप किया फिर हनुमान जी उड़ कर संजीवनी बूटी लाए और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा हो पाई।
ब्रह्मा जी का पुजारी ब्रह्मा जी के लोक में तथा शिव जी का पुजारी शिव लोक में, विष्णु जी का पुजारी विष्णु लोक में तथा ब्रह्म काल का पुजारी ब्रह्मलोक में जाता है। गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में स्पष्ट किया है कि ब्रह्म लोक पर्यन्त सब लोकों में गए साधक जन्म-मरण में रहते हैं। वे पुनः लौटकर पृथ्वी के ऊपर आते हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 वाली मुक्ति नहीं मिली जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में नहीं आते। सनातन परम धाम तथा परम शांति उसी को प्राप्त होती है जिसका फिर जन्म कभी न हो, सदा युवा बना रहे, कभी मृत्यु नहीं हो। सब सुर यानि देवता तथा ऋषि-मुनि उपरोक्त प्रभुओं की पूजा (सेवा) करते हैं। इसलिए उनको मोक्ष प्राप्त नहीं होता। अधिक जानकारी के लिए अवश्य पढ़ें पुस्तक “गीता तेरा ज्ञान अमृत”।
कबीर, हरि नाम विष्णु का होई। विष्णु विष्णु जपै जो कोई।। जो विष्णु को कर्ता बतलावै। कहो जीव कैसे मुक्ति फल पावै।। बहुत प्रीति से विष्णु ध्यावै। सो जीव विष्णु पुरी में जावै।। विष्णु पुरी में निर्भय नाहीं। फिर के डार देय भूमाहीं।।
जब मरे विष्णु मुरारि। कहाँ रहेंगे विष्णु पुजारी।।
यह फल विष्णु भक्ति का भाई। सतगुरू मिले तो मुक्ति पाई।।

मनमानी पूजा शास्त्र विरुद्ध है

सीता जी को निकालने के बाद अयोध्या को कभी भी दिए जला कर रोशन नहीं किया गया था। जब वह लौटे थे तो बम, फुलझड़ी, राकेट बम, अनार इत्यादि भी नहीं जलाए गए थे। न तो उपहारों का आदान-प्रदान किया गया था। वर्तमान समाज के लोग अपनी मनमानी पूजा कर रहे हैं। नकली दिवाली की खुशी का दावा ठोकते ठोकते समाज को उसने बीमारियों का घर बना दिया है। प्रतिवर्ष दिवाली पर जलाए जाने वाले बम पटाखे जानलेवा धुंआ उत्पन्न करते हैं जिससे बच्चों, बूढों और जवानों को दमे और सांस की घुटन जैसी बीमारियां हो जाती हैं। रावण का पुतला कभी नहीं जलाया गया था। फिर यह प्रतिवर्ष दिवाली मनाने और रावण फूंकने जैसी गलत परंपरा कहां से आई। हमारी भक्ति का आधार गीता, वेद, पुराण, ग्रंथ और शास्त्र होने चाहिए। किसी भी ग्रंथ में दिवाली और रावण दहन करना चाहिए, नहीं लिखा है। दिवाली वाले दिन आकाश में केवल धुंआ ही धुआं दिखाई देता है।

तो लोग दिवाली क्यों मना रहे हैं?

कार्तिक अमावस्या की वह काली रात अयोध्या के लिए खुशी का एकमात्र दिन था जब राम जी सीता माता संग अयोध्या लौटे थे। इसे त्यौहार का रूप रंग राम-सीता और अयोध्या वासियों ने नहीं दिया। दीवाली या अन्य कोई भी त्यौहार जो आज वर्तमान में मनाएं जा रहे हैं इनका लेना देना गीता, वेदों और अन्य ग्रंथों से नहीं हैं। यह सत्य कथा अवश्य है परंतु इसे त्यौहार रूप में मनाने से कोई लाभ नहीं। यह केवल मनोरंजन मात्र और यादगार के तौर पर मनाए जा रहे हैं। सच तो यह है कि राम जी और सीता का मिलन श्रापवश संभव ही नहीं था। राम जी सीता जी से मिलना चाहते थे परंतु सीता उनका मुख भी देखना नहीं चाहती थीं जिस कारण सीता धरती की गोद में समा गई और अंत में पश्चातापवश राम जी ने सरयू नदी में जल समाधि ली ।

कैसे हुई लक्ष्मी जी की उत्पत्ति?

पैंसठ वर्षीय पुष्पा जी से यह पूछने पर कि ,”आप दीवाली क्यों मनाते हैं! तो जवाब मिला इस दिन लक्ष्मी पूजन किया जाता है ताकि लक्ष्मी जी की कृपा हम पर बरसती रहे और इस दिन राम और सीता के घर लौटने कि भी हम खुशी मनाते हैं।”
काल ने जब दूसरी बार सागर मन्थन किया तो तीन कन्याऐं मिली। दुर्गा माता ने तीनों को बांट दिया। प्रकृति (दुर्गा) ने अपने ही अन्य तीन रूप (सावित्रा,लक्ष्मी तथा पार्वती) धारण किए तथा समुन्द्र में छुपा दी। सागर मन्थन के समय बाहर आ गई। वही प्रकृति तीन रूप हुई तथा भगवान ब्रह्मा को सावित्री, भगवान विष्णु को लक्ष्मी, भगवान शंकर को पार्वती पत्नी रूप में दी। तीनों ने भोग विलास किया, सुर तथा असुर दोनों पैदा हुए।
‘‘तीनों देवताओं तथा ब्रह्म साधना का फल‘‘
यदि आप विष्णु जी की भक्ति करते हो और उसी को कर्ता मानते हो तो आप विष्णु-विष्णु का नाम जाप करके विष्णु जी के लोक में चले जाओगे, अपना पुण्य समाप्त करके फिर पृथ्वी पर जन्म पाओगे। एक दिन विष्णु जी की भी मृत्यु होगी। इसलिए श्री विष्णु जी की भक्ति से गीता अध्याय 18 श्लोक 62 तथा अध्याय 15 श्लोक 4 वाली मुक्ति व सनातन स्थान प्राप्त नहीं हो सकता।

तीनों गुणों की भक्ति बिना सच्चे मंत्रों के व्यर्थ है।

ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव के उपासकों की भक्ति का कारण भगवान से केवल मांग और पूर्ति तक सीमित है। साधक भगवान से मांगते रहना चाहता है और बदले में आरती, गीत और गलत मंत्र जाप करता है। सच तो यह है कि न तो यह तीनों देवता असली भगवान हैं और न ही यह साधकों को बदले में कुछ दे सकते हैं। भगवान से हमें धन, संपत्ति, औलाद और घर नहीं मोक्ष की कामना करनी चाहिए।
पूर्ण परमात्मा राम भगवान का दादा है।
काल ज्योति निरंजन राम जी का पिता है और परमात्मा कबीर साहेब ज्योतिनिरंंजन काल के पिता हैं। काल कबीर साहेब जी की सत्रहवीं संतान है। काल श्राप वश हमें इस पृथ्वी लोक पर ले आया। दुर्गा इसकी पत्नी है और ब्रह्मा, विष्णु, शंकर इसके तीन पुत्र हैं यह पांचों मिलकर मनुष्य को यहां उलझाए रखते हैं। कभी त्यौहार मनवा कर तो कभी व्रत रखवा कर।

परमात्मा इन नकली त्यौहार मनाने वालों से कभी खुश नहीं होता।

सतभक्ति ही जीवन का सार है। त्रिगुण माया के उपासक अपने ईष्ट से केवल धन, संतान, ऊंची कोठी और माया ही चाहते हैं और इसी में अपना जीवन व्यर्थ गंवा जाते हैं। राम जी जो विष्णु जी के अवतार हैं, यह सतगुण हैं। इनका कार्य जीव को सदा माया और मोह में उलझाए रखना है। इनके चक्रव्यूह से वही बाहर निकल सकता है जो सतभक्ति करता है जो कबीर जी को पहचानता है और काल को जान जाता है।
यदि भगवान से लाभ लेना है तो उसकी विधि न्यारी और सीधी है, तत्वज्ञान प्राप्त करना और तत्वदर्शी संत की शरण में जाना। अवश्य पढ़ें पुस्तक “ज्ञान गंगा”।
परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि :-
तीन देव की जो करते भक्ति। उनकी कबहु ना होवै मुक्ति।।
भावार्थ :- परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि जो साधक भूलवश तीनों देवताओं रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिव की भक्ति करते हैं, उनकी कभी मुक्ति नहीं हो सकती। यही प्रमाण श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तथा 20 से 23 में भी है। कहा है कि साधक त्रिगुण यानि तीनों देवताओं (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) को कर्ता मानकर उनकी भक्ति करते हैं। अन्य किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। जिनका ज्ञान हरा जा चुका है यानि जिनकी अटूट आस्था इन्हीं तीनों देवताओं पर लगी है, वे राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए हैं, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म (बुरे कर्म) करने वाले मूर्ख हैं। गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि वे मेरी (काल ब्रह्म यानि ज्योति निरंजन की) भक्ति नहीं करते। उन देवताओं को मैंने कुछ शक्ति दे रखी है। परंतु इनकी पूजा करने वाले अल्पबुद्धियों (अज्ञानियों) की यह पूजा क्षणिक सुख देती है। स्वर्ग लोक को प्राप्त करके शीघ्र जन्म-मरण के चक्र में गिर जाते हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश और लक्ष्मी उपासकों को इनकी सही भक्ति विधि जाननी चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को पूर्ण ब्रह्म परमात्मा कबीर साहेब जी द्वारा दी जाने वाली सतभक्ति करनी चाहिए। सतभक्ति मनुष्य को अज्ञान रुपी अंधकार से निकाल कर ज्ञान की रोशनी में ले जाएगी। असली दिवाली प्रत्येक मनुष्य को मनानी चाहिए क्योंकि कबीर साहेब जी संत रामपाल जी महाराज रूप में पृथ्वी पर उपस्थित हैं।
परमात्मा की सतभक्ति करने वालों के घर रोज़ सतभक्ति की दिवाली मनाई जाती है। इस दिवाली सपरिवार सत्संग देखिए साधना चैनल पर सांय 7:30-8:30 pm पर।

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