Diwali 2026 (दीवाली): दीपावली पर जानिए कैसे होगा हमारे जीवन में मोक्ष रूपी उजाला?

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Last Updated on 17 October 2026 IST | दीपावली 2026 (Diwali in Hindi): दीपावली या दिवाली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। यह पर्व देशभर में विभिन्न लोकवेद आधारित धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। 

क्या आप जानते हैं कि रावण वध के बाद भगवान राम के अयोध्या आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया था, लेकिन मान्यता है कि अयोध्यावासियों ने दो वर्ष बाद ही दीपावली का त्योहार मनाना त्याग दिया था? आज दीपावली का स्वरूप काफी बदल चुका है। लोग पटाखों से अनावश्यक रूप से ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण फैलाते हैं एवं शास्त्रविरुद्ध साधना करते हैं। धीरे-धीरे यह त्योहार अपनी आध्यात्मिक भावना से दूर होकर मात्र आडम्बर का रूप ग्रहण कर चुका है।

लेकिन क्या हमने कभी विचार किया है कि दीपावली मनाने का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या हमारी धार्मिक परंपराएँ पवित्र शास्त्रों के अनुरूप हैं? क्या केवल रीति-रिवाजों का पालन करना ही सच्ची भक्ति है?

Table of Contents

दीपावली के त्योहार की पौराणिक कथा (Diwali Story in Hindi)

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में विष्णु अवतार श्री राम जी और सीता जी को 14 वर्ष का वनवास हुआ था। वनवास के दौरान ही रावण ने सीता जी का हरण किया। उसके बाद राम जी सीता जी को रावण से युद्ध कर लेकर आये। यही समय 14 वर्ष के वनवास के पूरे होने का भी था। अधर्मी रावण से सीता माता को वापस लेकर जब श्रीराम अयोध्या वापस लौटे तो अयोध्यावासियों की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। अपने प्रिय राजा रानी के आगमन की शुभ सूचना पाकर अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर उस अमावस्या की अंधकारमयी रात्रि को भी जगमग और उज्वल किया और श्री राम और माता सीता के आगमन की खुशी मनाई। किन्तु दीपावली (Diwali in Hindi) का यह त्योहार आयोध्यावासियों द्वारा दो बार तक ही मनाया जा सका।

धोबी के व्यंग्य से आहत होकर राजा राम ने सीता माता का त्याग कर दिया। दरअसल, राजा राम रात्रि के समय वेश बदलकर अयोध्या की गलियों में अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए निकला करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक धोबी को अपनी पत्नी से झगड़ते हुए सुना। धोबी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि वह राजा राम की तरह नहीं है, जो रावण के साथ रहने के बाद भी सीता को अपने घर में रख ले। धोबी के ये शब्द सुनकर राम जी अत्यंत व्यथित हुए। अगले दिन उन्होंने सभा बुलाई और सीता माता को महल से निष्कासित करने का निर्णय सुनाया। उस समय सीता माता गर्भवती थीं। उनके बार-बार विनती करने पर भी राम जी ने अपना निर्णय नहीं बदला। अंततः उन्होंने लक्ष्मण जी को सीता माता को अयोध्या से दूर वन में छोड़ आने का आदेश दिया। सीता माता ने अपना शेष जीवन महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में व्यतीत किया। इस घटना से अयोध्यावासी अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने इसके बाद कभी दीपावली का त्योहार नहीं मनाया। इसके बावजूद, लोकवेद को सत्य मानकर अंधश्रद्धालुओं ने अपनी मनमर्जी से इस त्योहार को दोबारा मनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार, आज यह त्योहार केवल एक परंपरा बनकर रह गया है, जिसका न तो कोई वास्तविक महत्व है और न ही कोई सार्थक उद्देश्य।

सिक्ख धर्म में इस दिन का विशेष महत्त्व है। इतिहास में प्रमाण है कि मुगल बादशाह जहांगीर ने श्री हरगोबिंद जी को ग्वालियर के किले में बंदी बना लिया था। कहा जाता है कि वर्ष 1609 से 1612 तक मुगल बादशाह जहांगीर ने श्री हरगोबिंद जी को लगभग तीन वर्ष नजरबंद रखा। वर्ष 1612 में श्री हरगोबिंद जी और 52 राजकुमार मुगलों की क़ैद से छूटे थे। इसी लिए उन्हें ‘बंदीछोड़’ भी कहा जाता है और उसी दिन से यह दिन सिक्ख धर्म में ‘बंदीछोड़ दिवस’ के नाम से जाना जाने लगा।

अयोध्यावासियों ने बंद कर दिया था दिवाली का त्योहार

दीपावली का त्योहार (Diwali Festival in Hindi) प्रतिवर्ष जोर शोर से मनाया जाता है। किंतु क्या आप जानते हैं जैसे ही माता सीता को अयोध्या से निकाल दिया गया था वैसे ही अयोध्यावासियों ने दीवाली का त्योहार मानना बंद कर दिया था। सीता माता एवं मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम अलग अलग हो चुके थे तथा अयोध्यावासियों के लिए दिवाली का कोई अर्थ नहीं रह गया था। प्रत्येक वर्ष लोकवेद के अनुसार मनमाने ढंग से ही सुख समृद्धि के लिए दिवाली मनाई जाती है। आइए जानें पूरे रहस्य को आखिर कौन है भगवान और कैसे मिलेगी सुख समृद्धि।

दीपावली 2026 (Diwali) का त्योहार कब मनाया जाता है?

Diwali in Hindi [2026]: दिवाली प्रत्येक वर्ष कार्तिक की अमावस्या को मनाए जाने वाला त्योहार है। दीपावली भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। भारतवर्ष में केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि सिख और जैन धर्म के लोगों द्वारा भी इस त्योहार को मनाया जाता है। जैन धर्म के लोग इस दिन को महावीर जैन के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं। तथा सिख समुदाय इसे बन्दीछोड़ दिवस के रूप में मनाते हैं। यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि वेदों में पूर्ण परमात्मा “कविर्देव“ का नाम लिखा है। उसी को बन्दीछोड़ भी कहा है। उसका नाम कबीर हैं। वह पापनाशक हैं और बन्धनों का शत्रु होने के कारण उसे बन्दीछोड़ कहा गया है। यदि सतगुरु से नाम दीक्षा लेकर दीप प्रज्वलित करके हर दिन यह त्योहार को मनाए तो सर्व पापों से छुटकारा मिल सकता है।

दीपावली 2026 (Diwali) किस तरह मनाई जाती है?

दीपावली के त्योहार को अयोध्यावासी दो वर्ष के बाद ही मनाना त्याग चुके थे। लोग पटाखों से अनावश्यक रूप से ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण फैलाते हैं एवं शास्त्रविरुद्ध साधना करते हैं। अब इस त्योहार ने मात्र आडम्बर का रूप ग्रहण कर लिया है। 

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 के अनुसार, शास्त्रविरुद्ध साधना करने वाले व्यक्ति को न तो कोई आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है और न ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार, श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 के श्लोक 12 से 15 में तीनों गुणों (रजगुण, सतगुण और तमगुण) से संबंधित पूजा करने वालों के स्वभाव और उनकी अज्ञानता का वर्णन किया गया है। इन श्लोकों में ऐसे व्यक्तियों को आसुरी स्वभाव वाले, मूर्ख और मनुष्यों में अधम बताया गया है। अतः गीता जी के इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि मनमाने ढंग से तथा शास्त्रविरुद्ध साधना करने के बजाय शास्त्रों में वर्णित भक्ति विधि को अपनाना चाहिए।

हिंदू धर्म में रंगोली बनाना एक सुंदर कला और शुभ अवसरों से जुड़ी परंपरा है। मान्यता है कि रंगोली बनाने से घर में सकारात्मकता और खुशियों का माहौल बना रहता है। लेकिन विचार करने वाली बात है कि क्या रंगोली बनाने मात्र से जीवन में वास्तविक सुख-शांति आ सकती है? इस संसार में बीमारी, कर्ज और अनेक दुखों का सिलसिला बना रहता है। यदि हमें स्थायी सुख और शांति चाहिए, तो पूर्ण संत की शरण में जाना होगा। वर्तमान में पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र पूर्ण संत जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं।

दिवाली हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है इस दिन लोग माता लक्ष्मी की उपासना करते हैं। कहते हैं कि इस दिन श्री रामचंद्र जी 14 साल के वनवास के बाद लौटे थे। रामायण के मुताबिक, भगवान श्रीराम जब लंकापति रावण का वध करके माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटे तो उस दिन पूरी अयोध्या नगरी दीपों से सजी हुई थी। कहते हैं कि भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर दिवाली मनाई जाती है। लेकिन जब 2 वर्ष बाद जब सीता माता को घर से निकाल दिया गया था उसके पहचात दशहरा, दीवाली मनाना सब बंद हो गया था। क्योंकि राजा और रानी ही भिन्न भिन्न हो गए तो खुशी किस बात की। अधिक जानकारी के लिए पढ़े पुस्तक ज्ञान गंगा।

परमात्मा कबीर साहेब जी बताते हैं:


सदा दीवाली संत की, बारह माह बसंत।
प्रेम (राम नाम)रंग जिन पर चढ़े, उनके रंग अनंत।।

त्रेतायुग में जब श्रीरामचंद्र जी, लक्ष्मण जी और सीता जी अपना वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा के चलते आज भी दीपावली पर दीप और लाइटें जलाई जाती हैं। मान्यता है कि प्रकाश अंधकार और नकारात्मकता को दूर करता है। लेकिन वर्ष में कुछ दिन दीप जलाने से जीवन का अज्ञान रूपी अंधकार कैसे दूर होगा?

वास्तविक उजियारा तो उस सतलोक में है, जहाँ प्रत्येक वस्तु प्रकाशमान है और मानव शरीर भी 16 सूर्यों के समान तेजस्वी है। सतलोक की संपूर्ण जानकारी प्रमाण सहित जानने के लिए Sant Rampal Ji Maharaj App डाउनलोड करें।

दिवाली के अवसर पर सुबह की शुरुआत तेलस्नान से की जाती है। तेल स्नान से शरीर की सफाई होती है, सर्दी के समय में तेल स्नान से गर्मी महसूस होती है। लोकवेद की मान्यता अनुसार इससे आत्मा की सफाई होती हैं। तेल स्नान से शरीर की सफाई हो सकती है लेकिन आत्मा की सफाई के लिए तेल स्नान कारगर नहीं है। सर्व प्रकार की बुराइयों से दूर होना ही आत्मा की सफाई हैं। आत्मा की सफाई सत्संग से होती है। सत्संग उसे कहते है जहां सत्य भाषण हो झूठ का समावेश न हो। सत्संग सतगुरु यानि सच्चे संत ही करते है।

लोकमान्यताओं के अनुसार, देवी लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी माना जाता है। इसी विश्वास के चलते लोग दीपावली पर धन-धान्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं। लेकिन तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के ज्ञान के अनुसार, यह पूजा-विधि पवित्र शास्त्रों में प्रमाणित नहीं है।

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 के श्लोक 23-24 में स्पष्ट किया गया है कि शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाने ढंग से की गई साधना से न तो कोई लाभ मिलता है, न सिद्धि और न ही परमगति प्राप्त होती है।

संत रामपाल जी महाराज जी के अनुसार, देवी-देवता साधक को उसके कर्मानुसार सीमित फल दे सकते हैं, लेकिन पूर्ण मोक्ष और स्थायी सुख-शांति की प्राप्ति पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की शास्त्रानुकूल भक्ति से ही संभव है। इसलिए धन प्राप्ति के लिए मनमानी पूजा करने के बजाय तत्वदर्शी संत से सतभक्ति का सही मार्ग जानना चाहिए।

Diwali (दीपावली 2026) मनाने से क्या लाभ है?

दीपावली का त्योहार लोकवेद पर आधारित मनमाने आचरण और शास्त्रविरुद्ध साधना से जुड़ा हुआ है। इसलिए ऐसी पूजा-पद्धतियों से श्रद्धालुओं को कोई आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं होता। दीपावली पर की जाने वाली लक्ष्मी-गणेश की पूजा भी शास्त्रों में वर्णित भक्ति विधि के अंतर्गत नहीं आती। मनुष्य को उसके कर्मों और भाग्य के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। केवल लक्ष्मी-गणेश की पूजा करने से भाग्य से अधिक धन की प्राप्ति नहीं हो सकती। यदि कोई व्यक्ति अपने भाग्य से अधिक सुख-समृद्धि और पूर्ण मोक्ष की कामना रखता है, तो उसे पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की शास्त्रानुकूल सतभक्ति करनी चाहिए।

क्या माता के गर्भ से जन्म लेने वाले ‘श्री राम’ भगवान है?

यह तो हम सभी जानते हैं कि जो जन्म लेता है वो मरता भी है लेकिन अगर बात करें परमात्मा की तो वो तो जन्म – मृत्यु से रहित है। तो क्या परमात्मा का जन्म आम इंसानों की तरह माँ के पेट से होता है? तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने बताया है कि परमात्मा की तीन प्रकार की स्थिति है। पहली स्थिति में वो ऊपर सतलोक में विराजमान रहता है, दूसरी स्थिति में वो जिंदा महात्मा के रूप में अपने भगतों को मिलता है और तीसरी स्थिति में वो विशेष बालक के रूप में एक तालाब में कमल के पुष्प पर प्रकट होकर धरती पर रहता है और कुंवारी गाय का दूध पीता है। इसका अर्थ यह हुआ कि श्री राम एक महान पुरुष तो माने जा सकते हैं लेकिन परमात्मा कदाचित नहीं। पूर्ण परमात्मा कोई और नहीं बल्कि कबीर साहेब हैं जो चारो युगों में आते हैं।

सतयुग में सतसुकृत कह टेरा, त्रेता नाम मुनिन्द्र मेरा।

द्वापर में करूणामय कहलाया, कलियुग में नाम कबीर धराया।।

दीपावली 2026: हमें किसकी भक्ति करनी चाहिए?

देवी भागवत महापुराण में ही देवी जी यानि दुर्गा जी अपने से अन्य किसी और भगवान की भक्ति करने के लिए कह रही है। इससे स्पष्ट है कि देवी दुर्गा जी से भी ऊपर अन्य कोई परमात्मा है जिसकी भक्ति करने के लिए दुर्गा जी निर्देश दे रही हैं। इससे स्पष्ट है कि देवी दुर्गा जी की भी भक्ति करना व्यर्थ है। वह पूर्ण परमात्मा तो कोई और है। पूर्ण परमात्मा की पूरी जानकारी तत्वदर्शी संत ही बता सकते हैं जो स्वंय पूर्ण परमात्मा ही होता है। गीता अध्याय 4 के श्लोक 34 में गीता ज्ञानदाता ने तत्वदर्शी संत की खोज करने के लिए कहा है।

जानिए अविनाशी परमात्मा के प्रमाण 

  • गुरु नानक साहेब की वाणी में स्पष्ट है कि कबीर परमेश्वर कोई और नहीं बल्कि वही कबीर साहेब हैं जो धानक रूप में काशी में रहते थे। इसका प्रमाण श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के राग ‘‘सिरी‘‘ महला 1 पृष्ठ नं. 24 पर शब्द नं. 29 में है-

एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल।

कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।

  • पूर्ण परमात्मा कविर्देव विशेष बालक के रूप में प्रकट होता है। उस परमात्मा का जन्म माँ के गर्भ से नहीं होता। वह बालक रूप में परमात्मा कुंवारी गाय का दूध पीता है l वह अपनी वाणी को सरल भाषा में अपने मुख से लोगों तक पहुंचाता है।

प्रमाण-: ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 1

  • गुरु नानक साहेब की अमृत वाणी से स्पष्ट है कि जो जिंदा महात्मा रूप में उन्हें मिले थे वो कोई और नहीं, बल्कि काशी वाले कबीर साहेब थे। नानक साहेब की वाणी में अनेकों प्रमाण हैं कि कबीर साहेब पूर्ण परमात्मा सृष्टि के रचनहार हैं। इसी का प्रमाण गुरु गुरुग्रन्थ साहेब पृष्ठ 721 पर अपनी अमृतवाणी महला 1 में है –

“हक्का कबीर करीम तू, बेएब परवरदीगार।

नानक बुगोयद जनु तुरा, तेरे चाकरां पाखाक।।”

  • कुरान शरीफ में भी प्रमाण मिलता है कि कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा हैं। पवित्र कुरान शरीफ के सुरत फुर्कानि 25 आयत 52 से 59 के अनुसार कबीर परमात्मा ने छः दिन में सृष्टि की रचना की तथा सातवें दिन तख्त पर जा विराजे जिससे सिद्ध होता है कि परमात्मा साकार है ।
  • पवित्र बाईबल में भी यही प्रमाण है कि उस परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार बनाया।
  • आदरणीय दादू साहेब की वाणी में भी यह प्रमाण है जब वह सात वर्ष के थे तो परमात्मा कबीर साहेब उन्हें जिंदा महात्मा के रूप में मिले थे। कबीर जी उन्हें सतलोक लेकर गए और वापिस पृथ्वी पर छोड़ा।

जिन मोकुं निज नाम दिया, सोइ सतगुरु हमार।

दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सृजन हार।।

हम सुल्तानी नानक तारे, दादू कूं उपदेश दिया।

जाति जुलाहा भेद न पाया, काशी माहे कबीर हुआ।।

पूर्ण परमात्मा को पाने के लिए सतगुरु को कैसे ढूंढें?

श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 15 श्लोक 1-4, 16,17 के अनुसार तत्वदर्शी संत वह है जो संसार रूपी उल्टे लटके हुए वृक्ष के सभी भागों को स्पष्ट बताएगा। तत्वदर्शी संत सभी धर्मों के पवित्र सद्ग्रन्थों में छुपे हुए गूढ़ रहस्यों को भक्त समाज के समक्ष उजागर करता हैं। यजुर्वेद अध्याय 19 के मंत्र 25, 26 में भी पूर्ण तत्वदर्शी संत की पहचान दी है। साथ ही गीता अध्याय 17 के श्लोक 23 में ॐ-तत-सत तीन सांकेतिक मन्त्रों का ज़िक्र है जिनसे मुक्ति सम्भव है। ये मन्त्र भी एक पूर्ण तत्वदर्शी संत ही दे सकते हैं।

सतगुरु की पहचान संत गरीबदास जी की वाणी में:

गरीब, सतगुरु के लक्षण कहूं, मधुरे बैन विनोद |

चार बेद षट शास्त्र, कह अठारा बोध ||

पूर्ण संत चारों वेदों, छः शास्त्रों, अठारह पुराणों आदि सभी ग्रंथों का पूर्ण ज्ञाता होता है वह उनका सार जानता है। वर्तमान में इस पूरी धरा पर एकमात्र तत्वदर्शी जगतगुरु रामपाल जी महाराज हैं जो सभी धर्मों के ग्रन्थों से प्रमाणित गूढ़ रहस्यमयी ज्ञान बताते हैं। 

इस दीवाली (Diwali in Hindi 2026) पर पूर्ण परमात्मा को कैसे प्राप्त करें?

कबीर परमात्मा ही सर्वोच्च, सर्वसुखदायक, आदि परमेश्वर हैं। वे बन्दीछोड़ हैं व पापों के नाशक हैं। पूर्ण परमात्मा को पाने के लिए ऐसे महान सतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज की शरण में आकर उनसे पूर्ण परमात्मा प्राप्ति के बारे में यथार्थ भक्ति विधि के बारे सतज्ञान अर्जित करें। इस संसार में एक पल का भी भरोसा नहीं अतः अतिशीघ्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी से निशुल्क नाम-दीक्षा ले कर भक्ति करें।

अधिक जानकारी एवं आध्यात्मिक ज्ञान के लिए Sant Rampal Ji Maharaj Youtube चैनल पर 3 अक्टूबर 2026 से प्रारंभ हुए शास्त्रार्थ के शंखनाद की किस्त 1 से 10 तक अवश्य देखें। इनके माध्यम से परिचय प्रभु का, सृष्टि रचना, पूर्ण परमात्मा के वास्तविक स्वरूप और उनकी भक्ति विधि का प्रमाण सहित ज्ञान प्राप्त करें।

FAQ about Diwali 2026

दीपावली (Diwali in Hindi) किस उपलक्ष्य में मनाई जाती है?

दीपावली का त्योहार अयोध्या में श्री राम तथा सीता के वनवास से लौटने की खुशी में मनाया जाता है।

दीपावली किस तिथि को मनाई जाती है?

दिवाली प्रतिवर्ष कार्तिक की अमावस्या को मनाई जाती है।

श्री रामचंद्र जी कितने वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या वापिस लौटे थे?

श्री रामचंद्र जी 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या वापिस लौटे थे।

दीपावली को सिक्ख धर्म में और किस नाम से जाना जाता है?

सिख धर्म में दीपावली को ‘बंदीछोड़ दिवस’ के नाम से जाना जाता है।

दीपावली किसका प्रतीक है?

दीपावली अंधेरे पर रोशनी, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है।

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