आत्मा के परमात्मा से जुड़ने से शुरू होगा रक्षाबंधन

भारत जन्म भूमि है संस्कृति, संस्कारों, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, वीरों और शहीदों की। साल के बारह महीनों में कई त्यौहार आते हैं। यह वही देश है जहां हर दिन किसी की बहन को दहेज की खातिर जला दिया जाता है। किसी की दूधमुंही बेटी और बहन की इज्ज़त को कोई भाई लूट कर उसे मार डालता है। यह वही भारत देश है जहां औरत को बहन और बेटी की नज़र से कम, काम – वासना और हवस मिटाने की वस्तु के रूप में अधिक देखा जाता है। यह वही देश है जहां स्वयं लड़कियां भी कम और छोटे कपड़े पहन कर बालीवुड में नाम, शौहरत और ढ़ेर सारा पैसा कमा कर समाज में कामुकता बढ़ाने का काम करती हैं। यह वही देश है जहां बलात्कारियों को सरकार की शह मिलती है और पीड़िता को परिवार समेत मरवा दिया जाता है।

रक्षाबंधन का शाब्दिक अर्थ है रक्षा करना

राखी को यदि धर्म से जोड़ कर देखा जाए तो यह हिंदुओं और सिखों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है। राखी का अर्थ है “रक्षा करना”। राखी के दिन एक भाई अपनी बहन की रक्षा करने का वादा करता है और बदले में, बहन अपने भाई की भलाई के लिए परमात्मा से प्रार्थना करती है। इस साल रक्षाबंधन 73वें स्वतंत्रता दिवस के ही दिन यानी 15 अगस्त को देश व विदेश में रहने वाले भारतीयों द्वारा मनाया जाएगा।
रक्षाबंधन का उल्लेख हमें पौराणिक कथाओं में तो पढ़ने को मिल सकता है परंतु हमारे पांचों वेदों, गीता जी और गुरूग्रंथ साहिब जी में इसे मनाने की विधि और आग्रह कहीं वर्णित नहीं है।
अचंभित करने वाला विचार यह है कि रक्षाबंधन मानव अवधारणा पर आधारित दिन है कि एक रानी ने अपने राज्य और जीवन रक्षा के लिए एक राज्य के राजा से सहायता प्राप्त करने हेतु उसे अपने विवेक अनुसार एक धागा भेजा था।
अयोध्या पति राजा राम जी की सबसे बड़ी बहन शांता थी, जो श्रृंगी ऋषि के साथ विवाह करके चली गई थी। शांता ने राजा राम की हथेली पर कभी रक्षासूत्र नहीं बांधा था। रावण की बहन श्रुपनखा ने रावण को कभी राखी नहीं बांधी थी। रावण ने तो अपनी बहन की कटी नाक के कारण राम और लक्ष्मण से बदला लेना चाहा था। रावण ने तनिक विचार किए बगैर सीता का अपहरण किया और उस अबला बहन पर बारह वर्ष तक बदनियत रखी।
द्रौपदी को जुए में हारने के बाद पांडव असहाय थे और मुंहबोले भाई और गुरू श्रीकृष्ण जी रूक्मिणी के साथ चौसर खेलने में व्यस्त थे। तब द्रौपदी की करूण पुकार पर स्वयं पूर्ण ब्रह्म परमात्मा कबीर साहेब जी को श्रीकृष्ण रूप में आकर द्रौपदी की रक्षा करनी पड़ी थी।
कबीर परमात्मा द्रौपदी के बारे में कहते हैं “जै मेरी भक्ति पिछोडी़ होई, हमरा नाम न लैवे कोई।” अर्थात:- मेरी भक्त बेटी पर अगर आंच भी आई तो फिर मुझे कौन याद करेगा? प्रत्येक बहन और बेटी को सच्चे परमात्मा को पहचान कर उनकी शरण गहन करनी चाहिए क्योंकि परमात्मा से जोडा़ गया बंधन अटूट होता है।

रक्षाबंधन पैसे और उपहारों का लेन-देन है

अब यह त्यौहार नहीं केवल रस्म भर रह गया है। बाज़ार रक्षाबंधन के उपलक्ष्य में पैसा कमाने की मंशा से भर जाते हैं। सभी छोटे बड़े व्यापारी,हलवाई, ब्यूटी पार्लर, मेंहदी लगाने वाले, राखी बेचने वालों का उद्देश्य रक्षाबंधन तक अपनी मोटी कमाई कर लेना भर रह गया है। समाज में औरत के प्रति पुरूषों की मानसिकता अति कमज़ोर है। अपनी बहन, बेटी और मां के अलावा दूसरे की बहन की इज्ज़त करने वालों की संख्या बहुत ही कम है।

रक्षा की प्रार्थना तो केवल परमात्मा से करनी चाहिए

आज के समय में शादी, पढा़ई और देश सेवा के उद्देश्य से दूर हुए भाई – बहन सालों साल एकदूसरे से मिलना तो दूर रक्षाबंधन के दिन भी आपस में मिल नहीं पाते हैं। देश की सेवा की खातिर बार्डर पर तैनात भाई रक्षाबंधन के दिन बहन और परिवार के पास छुट्टी न मिलने के कारण पहुंच नहीं पाते। कई बार समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों के माध्यम से पढ़ने और देखने को मिलता है कि रक्षाबंधन से पहले देशसेवा के दौरान फौजी भाई की शहादत के चलते उसका पार्थिव शरीर उसके घर पहुंचता है। कितने ही भाई- बहन सड़क दुघर्टना, बिमारी और अकस्मात मृत्यु के कारण मर जाते हैं। तब रक्षासूत्र इनकी रक्षा क्यों नहीं कर पाता। किसी बहन की करूण प्रार्थना उसके ईष्ट देव तक क्यों नहीं पहुंच पाती?

पूर्ण परमात्मा से ही करनी चाहिए सलामती की प्रार्थना

इस समय संपूर्ण विश्व गहन उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है। भारत के अधिकांश राज्य इस समय भंयकर तूफान और बाढ़ की चपैट में हैं। जिसके कारण लोग अपनों को और संपत्ति तक खो चुके हैं। ऐसे में एक बहन और भाई एक-दूजे की रक्षा करने में पूरी तरह से असमर्थ दिखाई देते हैं। वह दोनों असहाय हैं। प्राकृतिक आपदा हो या फिर किसी जानलेवा शारीरिक बीमारी के चलते बहन और भाई दोनों ही एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते। रक्षा करने वाला तो केवल परमात्मा है। जिनसे हमें प्रतिदिन, प्रतिक्षण अपनी और अपने परिवार की सलामती की दुआ करनी चाहिए ।

ये पिछलों की रीत हमें छोड़नी होगी

परमेश्वर कबीर जी ने बताया कि कलयुग में कोई बिरला ही भक्ति करेगा अन्यथा पाखण्ड तथा विकार करेंगे। आत्मा भक्ति बिना नहीं रह सकती, परंतु कलयुग में मन (काल का दूत है मन) आत्मा को अधिक आधीन करके अपनी चाल अधिक चलता है। कलयुग में मनुष्य ऐसी भक्ति करेगा जो लोकवेद पर आधारित होगी जिसमें दिखावा, खर्च तो अधिक होगा परंतु परमेश्वर से मिलने वाला लाभ शून्य होगा। लोकवेद और शास्त्र विरुद्ध साधना में लगा हुआ मनुष्य , समाज में प्रचलित झूठी दिखावटी भक्ति करेगा। त्योहार, जन्मदिन, दहेज देना और लेना, मांस भक्षण, नशा करना, पूजा, हवन, कीर्तन, जागरण, तांत्रिक पूजा, शनि, राहू, ब्रहमा, विष्णु, शंकर, दुर्गा जी पर आरूढ़ रहेगा और पूर्ण परमात्मा की भक्ति को नहीं समझ पाने के कारण सदा माया में उलझा रहेगा। शास्त्र विरुद्ध साधना के कारण ही मानव का बौद्धिक, शारीरिक और सामाजिक स्तर गिर गया है। पूर्ण परमात्मा से मिलने वाले लाभों के अभाव में प्राकृतिक आपदाएं मानव के लिए चुनौती बन गई हैं।

शास्त्र अनुकूल भक्ति विरासत की तरह है

कोयल पक्षी कभी अपना भिन्न घौंसला बना कर अण्डे-बच्चे पैदा नहीं करती। कारण यह कि कोयल के अण्डों को कौवा खा जाता है इसलिए कोयल को ऐसी नीति याद आई कि जिससे उसके अण्डों को हानि न हो सके। कोयल जब अण्डे उत्पन्न करती है तो वह ध्यान रखती है कि कहाँ पर कौवी ने अपने घौंसले में अण्डे उत्पन्न कर रखे हैं। जिस समय कौवी पक्षी भोजन के लिए दूर चली जाती है तो पीछे से कोयल उस कौवी के घौंसले में अण्डे पैदा कर देती है और दूर वृक्ष पर बैठ जाती है या उस घौंसले के आस-पास रहेगी। जिस समय कौवी घौंसले में आती है तो वह दो के स्थान पर चार अण्डे देखती है। वह नहीं पहचान पाती कि तेरे अण्डे कौन से हैं, अन्य के कौन-से हैं? इसलिए वह चारों अण्डों को पोषण करके बच्चे निकाल देती है। कोयल भी आसपास रहती है। अब कोयल भी अपने बच्चों को नहीं पहचानती है क्योंकि सब बच्चों का एक जैसा रंग (काला रंग) होता है। जिस समय बच्चे उड़ने लगते हैं, तब कोयल निकट के अन्य वृक्ष पर बैठकर कुहु-कुहु की आवाज लगाती है। कोयल की बोली कोयल के बच्चों को प्रभावित करती है, कौवे वाले मस्त रहते हैं। कोयल की आवाज़ सुनकर कोयल के बच्चे उड़कर कोयल की ओर चल पड़ते हैं। कोयल कुहु-कुहु करती हुई दूर निकल जाती है, साथ ही कोयल के बच्चे भी आवाज से प्रभावित हुए कोयल के पीछे-पीछे दूर चले जाते हैं। कौवी विचार करती है कि ये तो गए सो गए, जो घौंसले में हैं उनको संभालती हूँ कि कहीं कोई पक्षी हानि न कर दे। यह विचार करके कौवी लौट आती है। इस प्रकार कोयल के बच्चे अपने कुल परिवार में मिल जाते हैं। जो परमेश्वर का अंश होता है वह किसी भी युग काल में परमात्मा आते हैं उन्हें पहचान कर उनके पीछे हो चलते हैं। उन पर परमात्मा की प्रत्येक वाणी का प्रभाव होता है और व चले जाते हैं। जिस आत्मा को परमात्मा का ज्ञान समझ आ जाता है वह उनके पीछे हो चलता है। यही कहानी प्रत्येक परिवार में घटित होती है। जो अंकुरी हंस यानि पूर्व जन्म के भक्ति संस्कारी जो किसी जन्म में सतगुरू कबीर जी के सत्य कबीर पंथ में दीक्षित हुए थे, परंतु मुक्त नहीं हो सके। वे किसी परिवार में जन्मे हैं, सतगुरू की कबीर जी की वाणी सुनते ही तड़फ जाते हैं। आकर्षित होकर दीक्षा प्राप्त करके शिष्य बनकर अपना कल्याण कराते हैं। उसी परिवार में कुछ ऐसे भी होते हैं जो बिल्कुल नहीं मानते। अन्य जो दीक्षित सदस्य हैं, उनका भी विरोध तथा मजाक करते हैं।
कबीर परमात्मा ने कहा है कि,” जिस प्रकार शूरवीर तथा कोयल के सुत (बच्चे) चलने के पश्चात् पीछे नहीं मुड़ते। इस प्रकार यदि कोई मेरी शरण में इस प्रकार धाय (दौड़कर) सब बाधाओं को तोड़कर परिवार मोह छोड़कर मिलता है तो उसकी एक सौ एक पीढि़यों को पार कर दूँगा।

कबीर, भक्त बीज होय जो हंसा।
तारूं तास के एकोतर बंशा।।

संपूर्ण मानव जाति से अनुरोध है कि पूर्ण परमात्मा को पहचान कर शास्त्र अनुकुल भक्ति करें जिससे संपूर्ण परिवार लाभान्वित हो सकें।
(पूर्ण परमात्मा की पहचान के लिए अवश्य देखें साधना चैनल प्रतिदिन सांयकाल 7:30-8:30 बजे)

मछली एक पल भी पानी के बिना नहीं रह सकती तुरंत मर जाती है

मनुष्य जन्म परमात्मा द्वारा मनुष्य पर किया गया उपकार है। यदि मनुष्य जन्म प्राप्त प्राणी मनुष्य होने के अपने परम कर्तव्य को न समझ अन्य गलत साधना में लगा रहता है तो वह जन्म मृत्यु और चौरासी लाख जन्मों के कुचक्र में पड़ा रहता है। जन्म मृत्यु के रोग से बचाव का उपाय कोई रक्षाबंधन या भाईदूज नहीं कर सकता।
श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में, गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा, उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम (शाश्वतम् स्थानम्) को प्राप्त होगा (अध्याय 18 श्लोक 62)। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि तत्त्वज्ञान प्राप्ति के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर कभी संसार में नहीं आता। जिस परमेश्वर ने संसार रूपी वृक्ष की रचना की है, उसी की भक्ति करो।
(अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पुस्तक ज्ञान गंगा)

आत्मा और परमात्मा का बंधन ही रक्षाबंधन है

परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि सर्व प्राणी कर्मों के वश जन्मते-मरते तथा कर्म करते हैं। कर्मों के बंधन को सतगुरू छुड़ा देता है।

सब ग्रन्थ कहैं प्रभु नराकार, ऋषि कहैं निराकारा।।
उत्तम धर्म जो कोई लखि पाये। आप गहैं औरन बताय।। तातें सत्यपुरूष हिये हर्षे। कृपा वाकि तापर बर्षे।। जो कोई भूले राह बतावै। परम पुरूष की भक्ति में लावै।। ऐसो पुण्य तास को बरणा। एक मनुष्य प्रभु शरणा करना।। कोटि गाय जिनि गहे कसाई। तातें सूरा लेत छुड़ाई।। एक जीव लगे जो परमेश्वर राह। लाने वाला गहे पुण्य अथाह।। परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि ,”एक मानव (स्त्री-पुरूष) उत्तम धर्म यानि शास्त्र अनुकूल धर्म-कर्म में पूर्ण संत की शरण आता है, औरों को भी राह (मार्ग) बताता है। उसको परमेश्वर हृदय से प्रसन्न होकर प्यार करता है। जो कोई एक जीव को परमात्मा की शरण में लगाता है तो उसको बहुत पुण्य होता है। एक गाय को कसाई से छुड़वाने का पुण्य एक यज्ञ के तुल्य होता है। करोड़ गायों को छुड़वाने जितना पुण्य होता है, उतना पुण्य एक जीव को काल से हटाकर पूर्ण परमात्मा की शरण में लगाने का मध्यस्थ को होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि विश्व के सभी मनुष्यों को परमात्मा की खोज करनी चाहिए। पूर्ण परमात्मा संत, तत्वदर्शी, जगतगुरु और सतगुरु रूप में प्रत्येक युग में जीवों के उद्धार के उद्देश्य से आते हैं। परिवार का कोई भी सदस्य जो सतगुरु की शरण में जाता है उसका यह कर्तव्य बनता है कि वह अन्य अपने भाई बहनों, माता पिता, रिश्तेदारों, दोस्तों को भी परमात्मा के ज्ञान से अवगत कराएं।

मुख्य नोट: कबीर परमेश्वर जी कलयुग के इस ठीक के समय में जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के रूप में पृथ्वी पर उपस्थित हैं।