ईद के नाम पर मासूम जानवरों का कत्ल न करो

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क्या ईद के दिन मासूमों के क़त्ल से कोई जन्नत जा सका है आज तक?

जोर करि जबह करै, मुखसों कहै हलाल।
साहब लेखा माँगसी, तब होसी कौन हवाल।।

ईद-उल-अजहा यानी खुदा के लिए दी जाने वाली कुर्बानी वाली ईद जिसे बकरीद भी कहते हैं। बकरीद 12 अगस्त 2019 को पूरे भारतवर्ष में मनाई जाएगी। एक तरफ लाखों की संख्या में बकरों की बलि चढ़ाई जाएगी और इसी मौके पर लोग एकदूसरे को ईद की मुबारकबाद देंगे। ये कैसा जश्न है जहां एक तरफ खूनी नदी तो दूसरी तरफ बकरे के मांस के पकने की सड़न। चाहे इंसान जला लो या बकरा पका लो दोनों के पकने और जलने पर एक जैसी बदबू उठती है। कुर्बानी के बकरे के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। गोश्त का एक हिस्सा गरीबों में तकसीम किया जाता है, दूसरा दोस्त, अहबाब के लिए और वहीं तीसरा हिस्सा घर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यानी जीव हत्या के पाप में गरीब, अमीर, परिवार और दोस्तों की भी बराबर की हिस्सेदारी होती है।
कबीर-यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय। मुखमें आमिख मेलिके, नरक परेंगे जाय।

जब किसी के जनाजे़ से हम घर को लौट कर आते हैं तो सबसे पहले स्नान करने जाते हैं। क्यों? क्योंकि शायद मुर्दा के शरीर के आसपास जीवाणु होते होंगे। फिर जानवर को मारकर क्यों खाते हैं ?
टट्टी और पेशाब करके आते हैं तो सबसे पहले हाथ धोते हैं कि कहीं जीवाणु हाथ में चिपके न रह जाएं।
सभी मानव और जानवर के शरीर के भीतर खून, मल, पैशाब, थूक, बलगम भरा होता है। इन सभी चीजों के शरीर से बाहर आने और इन्हें देखने पर भी घिन्न होती है। जब मांस खाने वाले किसी कसाई की दुकान पर गोश्त खरीदने जाते हैं तो सामने कट रहे जानवर के शरीर में से खून की धारा बह चलती है। काटने वाला तो कसाई कहलाता है और खाने वाला मांसाहारी।
आतंकवादी वह व्यक्ति होते हैं जिनके दिलों में दूसरी कौम के लोगों के लिए दया खत्म हो चुकी होती है और यदि थोड़ी बहुत रह भी जाती है तो वह स्वयं के शरीर को बंब से उड़ाकर खत्म कर देते हैं। क्या आतंकवादी को बहिश्त (स्वर्ग) में स्थान मिलेगा। कदापि नहीं। तो कसाई और मांसाहारी को भी स्वर्ग में स्थान कभी नहीं नसीब होगा।

अल्लाह कबीर जी फरमाते हैं,

जीव हनै हिंसा करै, प्रगट पाप सिर होय।
निगम पुनि ऐसे पाप तें, भिस्त गया नहिं कोय।

अक्सर देखा गया है मुस्लिम परिवारों में बकरे और बकरी पाले जाते हैं परंतु ईद अल अदा आने पर वह उसी बकरे को खुदा, अल्लाह के लिए अपना फ़र्ज़ मानते हुए बलि दे डालते हैं। मेरी नज़र में एक कसाई, आतंकवादी और बलि चढ़ाने वाले मुसलमान में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों के ही दिल में दया का दरिया नहीं। हर साल ईद पर बकरों के खून से होली खेली जाती है। मनुष्य भी मां के गर्भ से जन्म लेता है और जानवर भी। सभी जानते हैं पूरी सृष्टि परमात्मा, अल्लाह की बनाई हुई है। अल्लाह की बनाई सृष्टि में फिर जानवर के साथ ये बदसलूकी क्यों? कुरान शरीफ़ को गौर से पढ़ने पर कहीं भी जानवर की बलि चढ़ाने का फरमान उस रहमान अल्लाह ताला का नहीं लिखा है। मुस्लिम भाई आस लगाए बैठे हैं कि अल्लाह को जानवर की बलि देंगे और फिर बहिश्त जाएंगे। ऐसा तो सपने में भी मुमकिन नहीं लगता।

मारी गऊ शब्द के तीरं, ऐसे थे मोहम्मद पीरं।।
शब्दै फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नहीं भाख्या, एैसे पीर मुहम्मद भाई।

नबी मोहम्मद जो मुस्लिम धर्म में आखिरी पैगंबर हुए हैं, आदरणीय हैं, जो प्रभु के अवतार कहलाए हैं। कसम है एक लाख अस्सी हजार को जो उनके अनुयाई थे उन्होंने कभी बकरे, मुर्गे तथा गाय आदि पर करद नहीं चलाया अर्थात् जीव हिंसा नहीं की तथा माँस भक्षण नहीं किया। वे हजरत मोहम्मद, हजरत मूसा, हरजत ईसा आदि पैगम्बर (संदेशवाहक) तो पवित्र व्यक्ति थे तथा ब्रह्म (ज्योति निरंजन/काल) के कृपा पात्र थे।
हजरत मुहम्मद जी जिस साधना को करते थे वही साधना अन्य मुसलमान समाज भी कर रहा है। वर्तमान में सर्व मुसलमान श्रद्धालु माँस भी खा रहे हैं। परन्तु नबी मुहम्मद जी ने कभी माँस नहीं खाया तथा न ही उनके सीधे अनुयायियों (एक लाख अस्सी हजार) ने माँस खाया। केवल रोजा व बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल (हत्या) नहीं करते थे।

एक समय नबी मुहम्मद ने एक गाय को शब्द (वचन सिद्धि) से मार कर सर्व के सामने जीवित कर दिया था। उन्होंने गाय का माँस नहीं खाया। अब मुसलमान समाज वास्तविकता से परिचित नहीं है। जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने के लिए गऊ मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी नहीं हो। आप माँस को प्रसाद रूप जान कर खाते तथा खिलाते हो। आप स्वयं भी पाप के भागी बनते हो तथा अनुयायियों को भी गुमराह कर रहे हो। आप दोजख (नरक) के पात्र बन रहे हो।
कबीर-माँस माँस सब एक है, मुरगी हिरनी गाय। आँखि देखि नर खात है, ते नर नरकहिं जाय।।

यह माँस तो कुत्ते का आहार है, मनुष्य शरीर धारी के लिए वर्जित है

माँस चाहे गाय, हिरनी तथा मुर्गी आदि किसी प्राणी का है जो व्यक्ति माँस खाते हैं वे नरक के भागी हैं।
जो काज़ी, पीर, मौलवी माँस भक्षण करते हैं तथा शराब पीते हैं उनसे नाम दीक्षा प्राप्त करने वालों की मुक्ति नहीं होती अपितु महानरक के भागी होंगे। जो व्यक्ति जीव हिंसा करते हैं (चाहे गाय, सूअर, बकरी, मुर्गी, मनुष्य, आदि किसी भी प्राणी को मारते हैं) वे महापापी हैं। पशु आदि को हलाल, बिस्मिल आदि करके माँस खाने व प्रसाद रूप में वितरित करने का आदेश दयालु (करीम) प्रभु का कब प्राप्त हुआ (क्योंकि पवित्र बाईबल उत्पत्ति ग्रन्थ में पूर्ण परमात्मा ने छः दिन में सृष्टि रची, सातवें दिन ऊपर तख्त पर जा बैठा तथा सर्व मनुष्यों के आहार के लिए आदेश किया था कि मैंने तुम्हारे खाने के लिए फलदार वृक्ष तथा बीजदार पौधे दिए हैं। उस करीम (दयालु प्रभु पूर्ण परमात्मा) की ओर से आपको फिर से कब आदेश हुआ ? वह कौन-सी कुआर्न में लिखा है ? पूर्ण परमात्मा ने सर्व मनुष्यों आदि की सृष्टि रचकर ब्रह्म (जिसे अव्यक्त कहते हो, जो कभी सामने प्रकट नहीं होता, गुप्त कार्य करता तथा करवाता रहता है) को दे गया। बाद में पवित्र बाईबल तथा पवित्र कुआर्न शरीफ आदि ग्रन्थों में जो विवरण है वह ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन) का तथा उसके फरिश्तों का है, या भूतों-प्रेतों का है। करीम अर्थात् पूर्ण ब्रह्म दयालु अल्लाहु कबीरू का नहीं है। उस पूर्ण ब्रह्म के आदेश की अवहेलना किसी भी फरिश्ते व ब्रह्म आदि के कहने से करने की सजा भोगनी पड़ेगी।

पूर्ण परमात्मा की आज्ञा की अवहेलना करने वाला पाप का भागी होगा क्योंकि कुआर्न शरीफ (मजीद) का सारा ज्ञान ब्रह्म (काल/ज्योति निरंजन, जिसे आप अव्यक्त कहते हो) का दिया हुआ है। इसमें उसी का आदेश है तथा पवित्र बाईबल में केवल उत्पत्ति ग्रन्थ के प्रारम्भ में पूर्ण प्रभु का आदेश है। पवित्र कुआर्न का ज्ञान दाता स्वयं कहता है कि पूर्ण परमात्मा जिसे करीम, अल्लाह कहा जाता है उसका नाम कबीर है, वही पूजा के योग्य है। उसके तत्त्वज्ञान व भक्ति विधि को किसी बाखबर (तत्त्वदर्शी संत) से पता करो। इससे सिद्ध है कि जो ज्ञान कुआर्न शरीफ आदि का है वह पूर्ण प्रभु का नहीं है।

जाका गला तुम काटि हो, सो फिर काटै तुम्हार

जब काजी के पुत्र की मृत्यु हो जाती है तो काजी को कितना कष्ट होता है। पूर्ण ब्रह्म (अल्लाह कबीर) सर्व का पिता है। उसके प्राणियों को मारने वाले से अल्लाह खुश नहीं होता। दर्द सर्व को एक जैसा ही होता है। यदि बकरे आदि का गला काट कर (हलाल करके) उसे स्वर्ग भेज देते हो तो काजी तथा मुल्ला अपना गला छेदन करके (हलाल करके) स्वर्ग प्राप्ति क्यों नहीं करते? जिस समय बकरी को मुल्ला मारता है तो वह बेजुबान प्राणी आँखों में आंसू भर कर म्यां-म्यां करके समझाना चाहता है कि हे मुल्ला मुझे मार कर पाप का भागी मत बन। जब परमेश्वर के न्याय अनुसार लेखा किया जाएगा उस समय तुझे बहुत संकट का सामना करना पड़ेगा। उस सृष्टि के मालिक की नजर से कोई नहीं बचा। जबरदस्ती निर्दयता से बकरी आदि प्राणी को मारते हो, कहते हो हलाल कर रहे हैं। इस दोगली नीति का आपको महाकष्ट भोगना होगा। काजी तथा मुल्ला व कोई भी जीव हिंसा करने वाला पूर्ण प्रभु के कानून का उल्लंघन कर रहा है, जिस कारण वहाँ धर्मराज के दरबार में खड़ा-खड़ा पिटेगा। यदि हलाल ही करने का शौक है तो काम, क्रोध, मोह, अहंकार, लोभ आदि को करो। पाँच समय नमाज़ भी पढ़ते हो व रोजों के समय रोजे (व्रत) भी रखते हो। शाम को गाय, बकरी, मुर्गी आदि को मार कर माँस खाते हो। एक तरफ तो परमात्मा की स्तुति करते हो, दूसरी ओर उसी के प्राणियों की हत्या करके पाप करते हो। ऐसे प्रभु कैसे खुश होगा ? अर्थात् आप स्वयं भी पाप के भागी हो रहे हो तथा अनुयायियों को भी गुमराह करने के दोषी होकर नरक में गिरोगे।

हलाल और झटका दोनों पाप कर्म हैं

कबीर परमेश्वर कह रहे हैं कि हे काजी, मुल्लाओं आप पीर (गुरु) भी कहलाते हो। पीर तो वह होता है जो दूसरे के दुःख को समझे उसे, संकट में गिरने से बचाए। किसी को कष्ट न पहुँचाए। जो दूसरे के दुःख में दुःखी नहीं होता वह तो काफिर (नीच) बेपीर (निर्दयी) है। वह पीर (गुरु) के योग्य नहीं है। उत्तम खाना नमकीन खिचड़ी है उसे खाओ। दूसरे का गला काटने वाले को उसका बदला देना पड़ता है। यह जान कर समझदार व्यक्ति प्रतिफल में अपना गला नहीं कटाता। दोनों ही धर्मों के मार्ग दर्शक निर्दयी हो चुके हैं। हिन्दूओं के गुरु कहते हैं कि हम तो एक झटके से बकरा आदि का गला छेदन करते हैं, जिससे प्राणी को कष्ट नहीं होता, इसलिए हम दोषी नहीं हैं तथा मुसलमान धर्म के मार्ग दर्शक कहते हैं हम धीरे-धीरे हलाल करते हैं जिस कारण हम दोषी नहीं। परमात्मा कबीर साहेब जी ने कहा यदि आपका तथा आपके परिवार के सदस्य का गला किसी भी विधि से काटा जाए तो आपको कैसा लगेगा ? क्या आप कलमा पढ़ कर अपने परिवारजनों को बहिश्त भेजने के लिए तैयार हो?

बात करते हैं पुण्य की, करते हैं घोर अधर्म। दोनों नरक में पड़हीं, कुछ तो करो शर्म।

फ़रिश्ते ने अकेले इब्राहिम की परिक्षा ली थी न कि इब्राहिम को मानने वाले सभी मुस्लिमों की। फ़रिश्ते ने जानवर की बलि का आदेश सभी मनुष्यों को प्रति वर्ष करने का ऐलान भी नहीं किया था। विचार कीजिए परीक्षा इब्राहिम की हुई और प्रत्येक साल अंधे गधों की तरह लाखों करोड़ों की संख्या में जीव हत्या की जा रही है। अल्लाह के दरबार में हर कर्म का लेखा-जोखा होता है फिर जीव हत्या तो ऐसा कसाई कर्म है जिसका बदला तो अपनी गर्दन कटवा कर देते रहना पड़ता है।

मुस्लिम हज के अंतिम दिन रमीजमारात जाकर शैतान को पत्थर मारते हैं जिसने इब्राहिम को खुदा के आदेश से भटकाने की कोशिश की थी। तो आपको नहीं लगता कि आज के काज़ी, पीर, मौलवी किसी शैतान से कम नहीं है जिन्हें न बाखबर के धरती पर होने का पता है न अल्लाह करीम का सही ज्ञान इनके पास है।

सबसे बडे़ खुदा अल्लाह को खुश करने की विधि, वास्तविक ज्ञान और भक्ति विधि को न तो हिन्दू संत, गुरुजन जानते हैं तथा न ही मुसलमान पीर, काज़ी तथा मुल्ला ही परिचित हैं। उस सर्व शक्तिमान परमेश्वर की पूजा विधि तथा पूर्ण ज्ञान को केवल बाख़बर संत रामपाल जी महाराज अल्लाह कबीर जी के भेजे हुए बाखबर जानते हैं। बाख़बर संत रामपाल जी महाराज की पनाह में आओ और बलि जैसे दैत्य कर्म से सदा के लिए मुक्ति पाकर बहिश्त (स्वर्ग) से भी ऊपर जाने का मार्ग जानो।

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