Jallianwala kand Vs Barwala Kand

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जलियांवाला बाग हत्याकांड की तर्ज पर हरियाणा प्रशासन द्वारा बरवाला कांड की साजिश रचकर मानव जाति को कलंकित किया गया।

आज भी जलियांवाला बाग हत्याकांड की याद आते ही सम्पूर्ण मानव जाति तथा हमारे देशवासियों की रूह कांप जाती है इसलिए सम्पूर्ण मानव जाति के संज्ञान हेतु यहां जलियांवाला बाग हत्याकांड तथा उसी के तर्ज पर हरियाणा प्रशासन तथा साजिशकर्ताओं द्वारा हरियाणा के हिसार जिले के बरवाला शहर में संत रामपाल जी महाराज तथा उनके अनुयायियों पर सतलोक आश्रम बरवाला में पुलिस बर्बरता तथा उन पर किये गए अमानवीय व अलोकतांत्रिक कार्रवाई में हुई निर्मम हत्याओं के प्रकरण पर कुछ संक्षेप में जानेंगे इसका उद्देश्य यह है ताकि इस तरह के जघन्य अपराध मानव जाति पर ना हों सके तथा प्रशासन की आँखे खुल सके और सामाजिक लोकतंत्र को मजबूती देने योग्य निर्णय लिये जा सकें। दोनों घटनाओँ का प्रकरण इस प्रकार है—

जलियांवाला बाग हत्याकांड:—-

साल 1919 में हमारे देश में ब्रिटिश सरकार द्वारा कई तरह के कानून लागू किये गए और इन कानूनों का विरोध हमारे देश के हर हिस्सों में किया जा रहा था। 16 फरवरी 1919 के दिन ब्रिटिश सरकार ने लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक “रॉलेक्ट” नाम का बिल पेश किया था और इस बिल को लेजिस्लेटिव काउंसिल ने मार्च के महीने में पास कर दिया था जिसके बाद ये बिल एक अधिनियम बन गया था।
जिसके अनुसार भारत की ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति को देशद्रोह के शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी और उस व्यक्ति को बिना किसी जज के सामने पेश किए जेल में डाल सकती थी। इसके अलावा पुलिस बिना किसी जांच के किसी भी व्यक्ति को हिरासत में रख सकती थी। इस अधिनियम ने भारत में हो रही राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार को ताकत दे दी थी।
इस अधिनियम की मदद से ब्रिटिश सरकार भारतीय क्रन्तिकारियों पर काबू पाना चाहती थी। हमारे देश में आजादी के लिए चल रहे आंदोलनों को पूरी तरह खत्म करना चाहती थी। इस अधिनियम का महात्मा गांधी सहित सभी भारतीय नेताओं ने विरोध किया तथा महात्मा गाँधी ने इस अधिनियम के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन पूरे देश में शुरू किया था।
साल 1919 में शुरू किया गया सत्याग्रह आंदोलन काफी सफलता के साथ पूरे देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चल रहा था। इस आंदोलन में हर भारतीय बढ़ चढ़ कर भाग ले रहा था। भारत के अमृतसर शहर में 6 अप्रैल 1919 को कई आंदोलनों के तहत एक हड़ताल की गई थी और धीरे-धीरे इस अहिंसक आंदोलन ने हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया। 19 अप्रैल को सरकार ने पंजाब से ताल्लुक रखने वाले दो नेताओं डॉ. सैफुद्दीन कच्छु और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार करके ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर से स्थानांतरित कर धर्मशाला भेज दिया जहां पर इन्हें नजरबंद कर दिया गया था। 10 अप्रैल को इनकी रिहाई करवाने के मकसद से यहां के लोग डिप्टी कमेटिर और मिल्स इरविंग से मुलाकात करना चाहते थे जिसके मिलने की इजाजत नही दी गई जिसके कारण गुस्साए लोगों ने रेलवे स्टेशन सहित कई सरकारी दफ्तरों को आग लगा दी जिसके कारण काफी सरकारी कागजात, इमारतों के नुकसान के साथ तीन ब्रिटिश अधिकारियों को जान गवानी पड़ी थी। जिसके उपरांत ब्रिटिश सरकार काफी खफा हुई थी और अमृतसर के हालातों पर काबू पाने के लिए राज्य की जिम्मेदार डिप्टी कमेटिर मिल्स इरविंग से लेकर जनरल REH डायर को सौंप दी गई थी। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार ने पंजाब शहर के इलाकों को देखते हुए मार्शल लॉ लगा दिया था इस लॉ के तहत नागरिकों की स्वतंत्रता पर तथा सामाजिक समारोह के आयोजन करने पर प्रतिबंध लग गया था। जहाँ कहीं भी तीन से ज्यादा लोग इकठ्ठे दिखाई देते उन्हें उठाकर जेल में डाल दिया जाता था। ब्रिटिश सरकार ने इस लॉ के जरिये क्रांतिकारीयों द्वारा आयोजित होने वाली सत्ताओं पर रोक लगाना चाहतीं थी ताकि क्रांतिकारी उनके शासन के खिलाफ़ कुछ ना कह सके।

12 अप्रैल 1919 वें दिन के दिन वहां के स्थानीय दो अन्य नेताओं को और चौधरी बुगा सिंह तथा महाशा रतन चंद को गिरफ्तार कर लिया गया था जिसके कारण स्थानीय लोगों का गुस्सा और बढ़ गया था जिसके परिमाण स्वरूप जिसके कारण ब्रिटिश पुलिस ने सख्ती बढ़ा दी थी।

दिनांक 13 अप्रैल 1919 के दिन बैसाखी का त्योहार भी था जिसके कारण वहाँ के स्थानीय लोग अमृतसर के हरिमंदिर साहब/स्वर्ण मंदिर गए थे। जलियांवाला बाग़ स्वर्ण मंदिर के करीब था इस दिन शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था। बैसाखी का त्योहार होने के कारण ज्यादा संख्या में लोग स्वर्ण मंदिर कुछ लोग घूमने भी आये हुए थे। कुछ लोग ताजा माहौल पर चर्चा करने के लिए आपस में शांतिपूर्ण सभाएं भी कर रहे थे।जिसकी खबर जनरल डायर को 12:40 पर मिली तथा शाम 4 बजे बिना चेतावनी दिए अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थीं। उस बाग में लगभग 10 फीट की दीवार थी। आने जाने के लिए एक ही रास्ता था जिसको बंद कर दिया गया था। लगभग 10 मिनट तक लगातार गोलियां चलवाई थीं। जिसमें लगभग हजारों लोगों की हत्या हो गयी थी। लगभग 1500 लोग घायल हो गए थे जिसमें बच्चे, महिला, बुजुर्ग तथा जवान सब शामिल थे। पल भर में वहां की जमीन लाल हो गयी थी। ब्रिटिश प्रशासन ने अपनी छवि विश्व भर में खराब न हो इसलिए मरने वालों तथा घायल होने वालों की संख्या कम बताई थी।
डायर पर उठे सवाल:–
इस नरसंहार की निंदा भारत के हर राजनेता ने की भी और इस घटना के बाद हमारे देश को आजाद कराने की कवायत और तेज हो गई थी। इस तरह हर भारतीय अपने-2 तरीके से इस नरसंहार का विरोध कर रहा था। जब घटना की जानकारी रविन्द्र नाथ टैगोर जी को मिली तो उन्होंने उस समय के वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड को पत्र लिखा तथा 1915 में उनको मिली नाईटहुड की उपाधि वापस करने की बात कही गयी थी। पूरे भारतवर्ष के विरोध के कारण ही ब्रिटिश शासन को भारत छोड़कर जाने पर विवश होना पड़ा था। किंतु जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी पूरे ब्रिटिश साम्राज्य के माथे पर कलंक है तथा जब तक मानव जाति रहेगी तब तक इसको कलंक के रूप में याद किया जाएगा।

सतलोक आश्रम बरवाला हत्याकांड:—

यह प्रकरण संत रामपाल जी महाराज तथा उनके अनुयायियों के बारे में दिया जा रहा है। संत रामपाल जी महाराज अद्वितीय अध्यात्म ज्ञान सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याणर्थ लगभग 1993 से दे रहे हैं। आज लगभग पूरी जनसंख्या को अक्षर ज्ञान है (पढ़ी -लिखी है ) जो संत जी के आध्यत्मिक ज्ञान का विश्लेषण कर सकती है तथा यह अंदाजा लगा सकती है कि इसी ज्ञान से ही सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण सम्भव है।
ज्ञान अज्ञान के मतभेद में समाज के एक वर्ग आर्य समाजियों द्वारा ज्ञान का उत्तर ज्ञान से न देकर वर्ष 2006 में संत रामपाल जी महाराज के साथ करौंथा कांड की घटना को अंजाम दिया तथा यह समाज एक मजबूत, सक्षम वर्ग होने के कारण प्रशासन प्रक्रिया को प्रभावित करते हुए करौंथा कांड के दौरान एक मृत व्यक्ति के शव को आश्रम में रखकर उनकी हत्या का मुकदमा संत रामपाल जी महाराज व उनके अनुयायियों पर लगाया। लेकिन साक्ष्यों के आधार पर संत जी का पक्ष मजबूत देखकर HC चंडीगढ़ ने संत रामपाल जी महाराज व उनके अनुयायियों को लगभग 2 वर्ष रोहतक जेल में रखने के बाद जमानत दे दी थी।
संत रामपाल जी महाराज जी ने समाज के लोगों में दोबारा इस तरह की घटना न हो यह सोचकर करौंथा आश्रम को छोड़ दिया था।
जिसके बाद वे अपने मानव कल्याणर्थ अद्वितीय भक्ति ज्ञान का प्रचार तथा प्रसार भक्तों के दूसरे आश्रम, सतलोक आश्रम बरवाला से कर रहे थे तथा करौंथा में साजिश के तहत लगाए गए केसों की संवैधानिक तरीके से कानूनी प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभा रहे थे। इसी दौरान संत रामपाल जी महाराज के अद्वितीय ज्ञान से पूरा लाभ मिलने पर तथा सुखी जीवन के महत्व को देखकर तथा मानव जीवन का उद्देशय भक्ति तथा मानव कल्याणर्थ है यह समझकर दिन प्रतिदिन उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी जो लगभग 80 लाख के लगभग हो चुकी थी तथा धीरे धीरे ज्ञान के प्रभाव से संत जी के अनुयायी मानव कल्याण में समाज मे मौजूद बुराइयों के खिलाफ पत्रों, पुस्तकों व ज्ञान चर्चाओं के माध्यम से आवाज़ उठाने लगी थी। पुस्तक जैसे – अदालत की गिरती गरिमा तथा आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ज्ञान अज्ञान के भेद बताने हेतु गीता तेरा ज्ञान अमृत, ज्ञान गंगा, जीने की राह इत्यादि अनेक पवित्र पुस्तकें मानव कल्याण हेतु उनके अनुयायियों द्वारा जन जन तक ज्ञान पहुंचाने के अभियान हेतु बांटी जाती थीं। जिसके कारण ज्ञान अज्ञान में मात (हारने)खाने वालों (आर्य समाजियों) को संत जी तथा उनके अनुयायियों से ईर्ष्या थी तथा कथित करौंथा कांड की तर्ज पर संत जी को कानूनी शिकंजे में फंसाने की फिराक में थे।
प्रकरण जुलाई 2014 का है जिस दिन संत रामपाल जी महाराज को प्रशासन की सुरक्षा में रोहतक कोर्ट में उपस्थित होना था। जिससे उनके अनुयाय पता चलने पर संवैधानिक तरीके से अनुशासन का परिचय देते हुए कोर्ट के आस पास के इलाके में पहुंच जाते थे। ( जैसे लोग अन्य पर्वों पर जाते हैं, उनके अनुयायी गुरु लगाव में पहुंचते थे।) लेकिन इन भक्तों में धार्मिकता कूट- कूट कर भरी थी जिसके कारण कितनी भी ज्यादा भीड़ हो कोई गलत घटना के घटने तथा अव्यवस्था की खबर कभी नहीं आयी थी। लेकिन प्रशासन की व्यवस्था सही न होने के कारण सुरक्षा कारणों से संत रामपाल जी महाराज की पेशी जुलाई 2014 में रोहतक कोर्ट में न कराकर हिसार कोर्ट में वीडियो कांफ्रेंसिंग के द्वारा पेशी करवाना प्रशासन द्वारा तय किया गया था जिसके लिए संत जी को प्रशासन सुरक्षा में हिसार कोर्ट में ले जाया गया। लेकिन हिसार कोर्ट में किसी वकील के हत्या होने से उस दिन कोर्ट में वर्क सस्पेंड था। उस दिन संत जी की पेशी भी न हो सकी। लेकिन प्रशासन की सुरक्षा में चूक होने के कारण वहां पर एक वकील द्वारा संत रामपाल जी महाराज से अभद्र व्यवहार करने के विरोध में उनके अनुयायियों ने वकील को धक्के देकर संत रामपाल जी महाराज से दूर कर दिया। इसके बाद उक्त वकील द्वारा प्रकरण को गलत तरीके से पेश करके हाइकोर्ट चंडीगढ में शिकायत की थी जिसका फायदा उठाकर हरियाणा प्रशासन तथा असामाजिक तत्व साजिश का ताना बुनना शुरू करतें हैं तथा हाइकोर्ट चंडीगढ़, संत रामपाल जी महाराज को कोर्ट की अवमानना के जुर्म में 5 नवंबर 2014 को हाइकोर्ट चंडीगढ़ पेश होने का सम्मन जारी करता है। संत जी मानव कल्याणार्थ कार्यकलापों में व्यस्त तथा ज्यादा कार्य की वजह से अस्वस्थ चल रहे थे जिसके कारण संत जी ने हाइकोर्ट चंडीगढ़ को कानूनी प्रणाली के तहत अपने अस्वस्थ होने के पेपर प्रस्तुत किये जिनको हाइकोर्ट चंडीगढ द्वारा असंवैधानिक तरीके से फाड़कर फेंक दिया गया तथा अपनी रुचि प्रशासन व साजिशकर्त्ताओं की साजिश का ताना बाना गढ़ने में लगाने लगे जिसके कारण दिन प्रतिदिन जनता की नजरों में मुजरिम दिखाने हेतु कागजों के रिकॉर्ड में सम्मन जारी करते गए तथा साजिश के तहत प्रशासन अपनी कवायत पूरी करते हुए जानबूझकर भारी संख्या में भक्तों के समागमों के दौरान भारी पुलिस बलों द्वारा आश्रम को घेरकर मीडिया द्वारा दुष्प्रचार करवाया गया था ताकि जनता को सच लगे। हाईकोर्ट चंडीगढ़ द्वारा कोर्ट में पेश होने का आदेश जारी किया गया लेकिन भीड़ का फ़ायदा उठाकर प्रशासन तथा साजिशकर्त्ताओं की साजिश पूर्ण करने के लिए जलियांवाला बाग हत्याकांड की तरह सतलोक आश्रम के अंदर जहरीले आँसू गैस के गोले, चिली बम पुलिस द्वारा दागे गये। इस बर्बर कार्रवाई ने 6 लोगों की निर्मम हत्या कर डाली और साजिश यहीं नहीं रुकी बल्कि इन मृतकों के परिवार की तरफ से पुलिस द्वारा झूठी शिकायत लिखकर इन 6 हत्याओं का मुकदमा संत रामपाल जी महाराज व उनके अनुयायियों पर लगा दिया गया तथा मृतक परिवार वालों की गवाही लेने से मना कर दिया गया। जिसके बाद हाइकोर्ट चंडीगढ़ के दखल देने से मृतक परिवार वालों की गवाही ली गई। जिसमें उन्होंने साफ मना किया कि हमने शिकायत नहीं दी तथा हमारे मृतक संबंधी संत जी के कारण नहीं मरे हैं (मीडिया में वीडियो भी मौजूद है मृतक के परिवार वालों का जिसमें वो साफ साफ बताते हैं) कि प्रशासन ने मारा है। इसके बावजूद हिसार कोर्ट ने संत रामपाल जी महाराज व उनके अनुयायियों को उम्रकैद की सजा सुना दी जो सरासर गलत है जो सामाजिक लोकतंत्र की हत्या मात्र है। जब शिकायतकर्ता ही नहीं है तो केस सिर्फ प्रशासन की साजिश थी तथा मीडिया द्वारा दुष्प्रचार इसलिए करवाया ताकि जनता की आंखों में धूल झोंक सकें।
ईश्वर प्रेमियों, साजिश इतनी ही नहीं है बल्कि 900 दूर-दराज से आने वाले भक्तों पर उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करते हुए उनपर देशद्रोह के मुकदमे लगाकर जेल में 3-4 सालों तक रखा ताकि प्रशासन के खौफ़/डर से कोई अनुयायी साथ ना दे सके। इन भक्तों में कुछ फौजी व्यक्ति भी हैं जो अपने परिवार को ढूंढते हुए लगभग दिसम्बर 2014 में हरियाणा पुलिस से अपने परिवार की जानकारी लेने गए तो उनको भी 18 नवंबर 2014 में बरवाला कांड में मौजूदगी दिखाकर देशद्रोह लगाकर जेल में 2-3 वर्षों तक बंद रखा गया। जबकि उनके पास सबूत थे जिनसे साबित होता है कि वो अपने कर्तव्य स्थान पर थे। समाज विरोधी प्रशासन तथा कुछ असामाजिक तत्वों ने साजिश रचकर लोकतंत्र की हत्या करके बेकसूर लोगों की हत्या करवा डाली तथा निर्दोष संत रामपाल जी महाराज व उनके अनुयायियों को अमानवीय व्यवहार तथा यातनाएं देकर जेल में बंद करके मानव कल्याण कार्यों को तो रोका ही है साथ ही हमारे देश के लोकतंत्र पर सदा-2 के लिए कलंक लगाने का कार्य किया है। अब जालियांवाला बाग हत्याकांड की पूरा विश्व निंदा करता है तथा विरोधियों का प्रशासन होने के बावजूद अंग्रेजों ने उस समय सिर्फ 5 महीनों के अंदर एक स्वतंत्र कमेटी का गठन नवंबर 1919 में किया था जिसकी रिपोर्ट पर शीघ्र अमल करते हुए मार्च 1920 में जनरल डायर को सेवानिवृत्त की सजा दी थी तथा आज भी ब्रिटिश साम्राज्य पूरी मानव जाति के सामने जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए शर्मिंदा है और तब तक रहेगा जब तक मानव जाति इस धरती पर मौजूद रहेगी।

इस लेख का प्रकरण सम्पूर्ण मानव समाज के लिए इसलिए किया गया है ताकि हमारे प्रशासन तथा समाज को बुराइयों से बचाया जा सके तथा हमारे देश पर से सतलोक आश्रम बरवाला के हत्याकांड तथा निर्दोष संतों पर अत्याचार के कलंक को धोया जा सके ताकि ब्रिटिश साम्राज्य की तरह हमारे देश तथा प्रशासन को सदैव निंदा का सामना ना करना पड़े।

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