भाई दूज ( Bhaiya Dooj ) Special

पूर्ण परमात्मा तो सर्वशक्तिमान है जिसके आगे यमराज भी नतमस्तक है।

भाई दूज ( Bhaiya Dooj ) का पर्व दीपावली के दो दिन बाद मनाया जाता है। पहले दीपावली उसके अगले दिन गोवर्धन पूजा और फिर भाई दूज मनाया जाता है। आज 8 नवंबर, 2018 को भाई दूज का पर्व मनाया जा रहा है।
Bhai Dooj के दिन बहनें भाई के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा कर उसकी आरती करती हैं। भाई दूज का मनमाना पर्व बहन के अपने भाई के प्रति प्रेम को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें इस दिन अपने भाई की खुशहाली के लिए ईश्वर से कामना करती हैं। यह पर्व रक्षाबंधन की तरह ही मनाया जाता है।

अज्ञानतावश लोग करते हैं यम की पूजा

पद्म पुराण के अनुसार कार्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को पूर्वाह्न में यम की पूजा करके यमुना में स्नान करने वाला मनुष्य यमलोक को नहीं जाता (अर्थात उसको मुक्ति प्राप्त हो जाती है)।
मथुरा में यमराज का मंदिर है। लोकवेद के अनुसार यहां पर भाई-बहन यमराज की पूजा करते हैं। ये पूजा यम्-द्वितीया पर होती है। मथुरा के विश्राम घाट पर एक विशेष स्नान होता है, जिसमें लाखों भाई-बहन इस मनोकामना के साथ मिलकर यमुना के जल में स्नान करते हैं कि वह अपने पापों से मुक्त होंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे।
विचार कीजिए यदि ऐसा होता तो यमुना के जल में रहने वाले जीव जंतु तो सीधे मोक्ष को प्राप्त होंगे क्योंकि वह तो दिन रात उसी जल में रहते हैं । मनुष्य जल में स्नान करके उसमें रहने वाले लाखों जीवों की हत्या अनजाने में ही कर देता है जिसका पाप उसके सिर यानी कर्मों में जोड़ दिया जाता है। ऐसे में मोक्ष की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती।

मनुष्य के कर्म तय करते हैं स्वर्ग और नरक गमन

सभी मनुष्यों का स्वर्ग और नरक जाना उनके कर्मों के आधार पर तय होता है। यदि मोक्ष पाना स्नान करने बराबर होता तो दुनियाभर के सभी मनुष्य यमुना में स्नान करके पार हो जाते। पाप कर्म भी करते और फिर यह सोच कर यमुना में डुबकी लगाते की अब नरक नहीं देखेंगे। यमराज जो मृत्यु का देवता है, उसकी पूजा करने के बाद भी व्यक्ति का स्वर्ग-नरक जाना नहीं रोका जा सकता। यह शक्ति तो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा के ही पास है केवल। वह सतभक्ति करने वाले साधक को मृत्यु के समय स्वयं लेने आते हैं और स्वर्ग और नरक से ऊपर के स्थान अमरलोक सतलोक लेकर जाते हैं। यम की पूजा से तो मोक्ष सपने में भी नहीं मिल सकता। मोक्ष प्राप्ति के लिए मनुष्य को पूर्ण परमात्मा की भक्ति करनी होती है जिस भक्ति को करने से जन्म और मृत्यु का रोग सदा के लिए समाप्त हो जाता है और व्यक्ति जीवनपर्यंत सदाचारी रह कर शास्त्र अनूकूल भक्ति करता है। भाईदूज व अन्य त्योहार मनाना शास्त्रविरुद्ध साधना करना है। तभी तो ऐसे मनमाने पर्वों को मनाने की विधि व साधना गीता और अन्य वेदों में कहीं नहीं है।

गीता में मनमाना आचरण करने वालों को मूर्ख कहा है

ज़रा सोचिए जो आदमी दूसरे की बहन, बेटी या बीवी का बलात्कार करेगा क्या वह भी इस तरह के स्नान के बाद नरक जाने से बच पाएगा। जो अपनी बहन के अलावा दूसरे की बहन , बेटी पर बुरी नज़र रखते हैं क्या वह भी नरक जाने से बच पाएंगे।
गीता अ.16 के श्लोक 23 में शास्त्र विरुद्ध भक्ति के लिए मना किया गया है।
सभी प्रचलित तीज त्यौहार मनमाना आचरण और लोकवेद पर आधारित हैं।

भैया दूज का पर्व 84 लाख योनियां नहीं छुड़ा सकता

पुराणों पर आधारित रहकर भक्ति कर्म करने वाले का मोक्ष तो बहुत दूर की बात है वह तो 84 लाख योनियों में जन्म मृत्यु से भी पीछा नहीं छुड़ा पाता। एक दिन यमुना में स्नान करने से पाप धुल जाते तो लोग 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा क्यों करते हैं।
।।उत्तम धर्म जो कोई लखि पाये। आप गहैं औरन बताय।।

 

तातें सत्यपुरूष हिये हर्षे। कृपा वाकि तापर बर्षे।।

जो कोई भूले राह बतावै। परम पुरूष की भक्ति में लावै।।

ऐसो पुण्य तास को बरणा। एक मनुष्य प्रभु शरणा करना।।

कोटि गाय जिनि गहे कसाई। तातें सूरा लेत छुड़ाई।।

एक जीव लगे जो परमेश्वर राह। लाने वाला गहे पुण्य अथाह।।

भावार्थ परमेश्वर कबीर जी कहते हैं कि एक मानव (स्त्री-पुरूष) उत्तम धर्म यानि शास्त्र अनुकूल धर्म-कर्म में पूर्ण संत की शरण में आता है औरों को भी राह (मार्ग) बताता है। उसको परमेश्वर हृदय से प्रसन्न होकर प्रेम करता है। जो कोई एक जीव को परमात्मा की शरण में लगाता है तो उसको बहुत पुण्य होता है। एक गाय को कसाई से छुड़वाने का पुण्य एक यज्ञ के तुल्य होता है। करोड़ गायों को छुड़वाने जितना पुण्य होता है, उतना पुण्य एक जीव को काल से हटाकर पूर्ण परमात्मा की शरण में लगाने का मध्यस्थ को होता है। भाई बहन और अन्यों को शीघ्र गलत साधना भक्ति त्याग कर सतभक्ति आरंभ करनी चाहिए।

गीता और वेदों अनुसार भक्ति करने से तत्वज्ञान मिलता है

गीता जी हमारा प्रमुख सदग्रंथ है। सतभक्ति की प्रबल इच्छा रखने वाले साधकों को गीता जी व वेदों को आधार बनाकर भक्ति करनी चाहिए। वेदों अनुसार साधना न करने वाले मनुष्य पूर्ण मुक्त नहीं होते।।
पवित्र गीता अध्याय 9 के श्लोक 23, 24 में कहा है कि जो व्यक्ति अन्य देवी-देवताओं को पूजते हैं वे भी मेरी काल की पूजा ही कर रहे हैं। परंतु उनकी यह पूजा अविधिपूर्वक यानि शास्त्रविरूद्ध है (देवी-देवताओं को नहीं पूजना चाहिए) क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता व स्वामी मैं ही हूँ। वे भक्त मुझे अच्छी तरह नहीं जानते कि यह काल है। इसलिए इसकी पूजा करके भी पतन को प्राप्त होते हैं जिससे नरक व चौरासी लाख जूनियों का कष्ट सदा बना रहता है। जैसे गीता अध्याय 3 श्लोक 14-15 में कहा है कि सर्व यज्ञों में प्रतिष्ठित अर्थात् सम्मानित, जिसको यज्ञ समर्पण की जाती है वह परमात्मा (सर्व गतम् ब्रह्म) पूर्ण ब्रह्म है। वही कर्माधार बना कर सर्व प्राणियों को प्रदान करता है। परन्तु पूर्ण सन्त न मिलने तक सर्व यज्ञों का भोग (आनन्द) काल (मन रूप में) ही भोगता है, इसलिए कह रहा है कि मैं सर्व यज्ञों का भोक्ता व स्वामी हूँ।

श्राद्ध निकालने (पितर पूजने) वाले पितर बनेंगे, उनकी मुक्ति नहीं होती तो गंगा – यमुना में स्नान करने वालों की कैसे हो सकती है!

वेदों ओर गीता जी में केवल एक पूर्ण परमात्मा की पूजा का ही विधान है, अन्य देवताओं, पितरों, भूतों की पूजा करना मना है। पुराणों में ऋषियों का आदेश है। जिनकी आज्ञा पालन करने से प्रभु का संविधान भंग होने के कारण कष्ट पर कष्ट उठाना पड़ेगा। इसलिए आन उपासना पूर्ण मोक्ष में बाधक है। और यमराज कोई पूर्ण परमात्मा नहीं है जिसकी पूजा अर्चना से कोई लाभ मिल सके। मोक्ष प्राप्त करने के लिए भाई बहन को यमुना स्नान करने से नहीं बल्कि तत्वज्ञान को समझ कर विधिवत् तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर सतभक्ति करनी होगी और तीन चरणों में दिए जाने वाले मोक्ष मंत्र के जाप से मुक्ति होगी।

शास्त्रविरूद्ध पूजा व्यर्थ होती है

अध्याय 16 के श्लोक 23,24 में कहा है कि जो व्यक्ति शास्त्रविधि को छोड़कर अपनी मन मर्जी से {रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तमगुण शिवजी तथा अन्य देवी-देवों की पूजा, मूर्ती पूजा, पितर पूजा, भूत पूजा, श्राद्ध निकालना, पिण्ड भरवाना, धाम पूजा, गोवर्धन की परिक्रमा करना, तीर्थों के चक्कर लगाना, तप करना, पीपल-जाँटी-तुलसी की पूजा, बिना गुरु के नाम जाप, यज्ञ, दान करना, गुड़गांवा वाली देवी, बेरी वाली, कलकते वाली, सींक पाथरी वाली माता की पूजा, समाध की पूजा, गुगा पीर, जोहड़ वाला बाबा, तिथि पूजा (किसी भी प्रकार का व्रत करना), बाबा श्यामजी की पूजा, हनुमान और यमराज आदि की पूजा शास्त्रविरूद्ध कहलाती है।} पूजा करते हैं, वे न तो सुखी हो सकते, उनको न सिद्धि यानि आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है और न ही उनको मुक्ति प्राप्त होती। इसलिए अर्जुन शास्त्र विधि से करने योग्य कर्म कर जो तेरे लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं कि गलत साधना लाभ के स्थान पर हानिकारक होती है।
कबीर जी ने कहा है कि :-
कबीर एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। माली सींचे मूल कूँ, फलै फूलै अघाय।।

बहन-भाई को सतभक्ति का मार्ग खोजना चाहिए। सुनी सुनाई लोक कथाओं पर आधारित भक्ति करके अनमोल मानुष जीवन व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए क्योंकि अंत समय में यम के दूत ही गलत साधना करने वालों का गला दबोच कर लें जाते हैं और धर्मराय के उनके कर्मों का लेखा जोखा देखने के बाद स्वर्ग और नरक में यात्नाएं भोगने के लिए धकेल दिया जाता है। स्वर्ग की आशा करने वाले भी मोक्ष कदापि नहीं प्राप्त कर सकते।

 

पृथ्वी पर परमात्मा स्वयं तत्वदर्शी संत जगतगुरु रामपाल जी महाराज जी के रूप में सतभक्ति का मार्ग और मानव जीवन में इसका महत्व बतानेे आए हुए हैं। अपने जीवन को नई सतभक्ति की दिशा दीजिए जिससे जीने की राह मिलेगी और मोक्ष का सतमार्ग मिलेगा।

नोट: मोक्ष का अर्थ जन्म मृत्यु से सदा के लिए मुक्ति होता है जो केवल सतगुरू की सतभक्ति से ही संभव है।