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बीजेपी के चौकीदार चोर हैं

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चोर भी यदि अपने नाम के आगे चौकीदार लिख ले तो इसका मतलब यह नहीं माना जाएगा की अब वह चोर नहीं रहा।
प्रत्येक मौजूदा सरकार ने अपने शासनकाल में अच्छे कार्य भी किए साथ ही साथ अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा और रसूल का दुरूपयोग करके देश और जनता के पैसे से अपनी संपत्ति भी खूब बनाई , विदेशी बैंकों में पैसा जमा किया , भाई भतीजावाद को बढ़ावा दिया , अपने सगे संबंधियों को सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करवाया, देश में अराजकता , मंहगाई , भाषावाद, रंगभेद और धार्मिक मुद्दों को उछाल कर हिंदू मुस्लिम को आपस में लड़वाया।
राजनीति अब देशसेवा व जनहित का कार्य न रह कर अलगाववाद व राजनीतिक गुंडागर्दी का गढ़ बन चुका है । देश-समाज सेवा बाद में नेता लोग वाहवाही लूटने और जनता को मूर्ख बना कर अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करके अपने द्वारा किए गए गलत कामों को नई सरकार के मत्थे मार कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
वर्तमान बीजेपी सरकार ने जनता के पैसे का बहुत दुरूपयोग किया है । इस सरकार के आला नेताओं से लेकर जूनियर नेता , अधिकारी , पुलिस प्रशासन,सरकार, अफसर,आईजी,आईपीएस , बड़े व्यापारी सभी किसी न किसी बड़े स्कैंडल में लिप्त हैं।देश का अधिकतर पैसा बड़े व्यापारियों के बड़े बड़े घोटाले करने पर उन्हें भगोड़ा बनाने में प्रयोग किया गया है। बड़े व्यापारियों को लाभ पहुंचाकर नेतागण अपना बैंक बैलेंस अरबों खरबों करने में व्यस्त हैं।
प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री सत्ता की लोलुपता में इतने मशगूल हो गए हैं कि स्वयं को संविधान से ऊंचा समझने लगे हैं।

ट्रांसपोर्ट घोटाला

बीजेपी सरकार की देखरेख में ट्रांसपोर्ट घोटाला फलताफूलता रहा। घोटाले में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय परिवहन मंत्री नीतिन गडक़री, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, हरियाणा के परिवहन मंत्री कृष्ण पंवार, केंद्र व दिल्ली सरकार के बड़े-बड़े आईएएस अफसर, हरियाणा के ट्रांसपोर्ट विभाग के कई बड़े अधिकारियों तथा अनेक कारपोरेट घरानों के सीईओ (CEO) की अहम भूमिका पाई गई है। यह सभीे जनता के साथ धोखा ,संविधान और कोर्ट की अवमानना बार बार कर रहे हैं।

शिकायतकर्ता का नाम है मुकेश सोनी कुल्थिया

ट्रांसपोर्ट घोटाला मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस घोटाले के संबंध में कोर्ट में मुकदमा चलाए जाने की इजाजत मिल चुकी है और गुरूग्राम की सैशन अदालत में दो मुकदमे शुरू हो चुके हैं। पहला मुकदमा मुकेश सोनी कुल्थिया बनाम नीतिन गडक़री एंड अदर्स है, जबकि दूसरे मुकदमे का नाम मुकेश सोनी कुल्थिया बनाम मनोहर लाल खट्टर और अन्य हैं। इन दोनों मुकदमों में कुल 28 लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर ARPGI (एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्मज एंड पब्लिक  ग्रिवेंसिज ऑफ इंडिया) कार्यालय, हरियाणा के मुख्यमंत्री का कार्यालय, हरियाणा के परिवहन मंत्री कृष्ण पंवार , ट्रांसपोर्ट विभाग हरियाणा, दर्जनों आईएस व प्रशासनिक अधिकारियों,  गुरूग्राम के पुलिस कमीश्नर, गुरूग्राम के सेक्टर- 9 के पुलिस स्टेशन और गुरूग्राम नार्थ के सब डिविजनस मजिस्ट्रेट (SDM) के ऑफिस भी शामिल हैं।
गुरूग्राम के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अश्विनी कुमार मेहत्ता की अदालत में चल रहे इन दोनों केसों में साढ़े तीन सौ पृष्ठ की शिकायत में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए गए हैं और आरोपों के पक्ष में बड़ी तादाद मेें सबूत भी लगाए गए हैं। आरोपों और सबूतों का अवलोकन करने के बाद ही अदालत ने सभी आरोपियों को समन जारी कर अदालत में हाजिर होने का हुक्म जारी किया है। उपर्लिखित सभी व्यक्तियों के नाम पर अदालत की तरफ से बार बार समन भेजने के बाद भी जब कई आरोपी अदालत में पेश नहीं हुआ तो अदालत को उनके जमानती वारंट जारी करने का निर्णय लेना पड़ा है।

यह एक तरह से कोर्ट की तौहीन है।

सेशन कोर्ट के बाहर लगी केस की तारीख के नोटिस की प्रति जिसमें केस नंबर 19 व 20 पर क्रमश: नितिन गडकरी व मनोहर लाल खट्टर के नाम हैं।प्रधानमंत्री कार्यालय अभी भी कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ है, जबकि कोर्ट के समन की तामील हो चुकी है। इसी तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी समन मिल जाने के बाद भी कोर्ट में पेश होने से बच रहे हैं।

सनद रहे यह वही बीजेपी सरकार है जिसने कोर्ट का जबरन आदेश पारित करवाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने संत रामपाल जी के नवंबर ,2014 में बीमार होने और कोर्ट से हाज़िरी माफी होने के बावजूद निर्दोष संत रामपाल जी को जबरन गिरफ्तार करने के लिए 40,000 पुलिस बल के साथ बरवाला आश्रम पर हमला करने के आदेश जारी कर दिए थे, जिसमें छह निर्मम हत्याएं करवाईं और हत्याओं का दोषी भी संत रामपाल जी को बना दिया।
संत रामपाल जी और उनके लगभग 950 अनुयायियों को जबरदस्ती देशद्रोही बना कर जेल में डाला। करोड़ों रूपए का नुक़सान करवाया और आज यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर संविधान को अंगूठा दिखाते हुए अपनी कारगुज़ारी कर रहे हैं।और स्वयं तो जनता को लूट ही रहें हैं अपने चमचों से भी देश की धन-संपत्ति लूटवाने में कोई असर नहीं छोड़ रहे हैं।

हो सकते हैं गैर जमानती वारंट जारी

कोर्ट अब उन सभी आरोपियों के गैर जमानती वारंट जारी कर सकता है जो जमानती वारंट जारी होने के बावजूद कोर्ट में हाजिर नहीं हो रहे। कोर्ट ने सोमवार को चार और लोगों के गैर जमानती वारंट जारी किये हैं जबकि चार अन्य आरोपियों के बैलेबल वारंट जारी कर सभी को अगली सुनवाई पर यानि 20 अप्रैल को कोर्ट में हाजिर होने का हुक्म दिया है। अदालत में इन सभी आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा-120बी (आर्थिक लाभ के लिए धोखा देने की नीयत से साजिश रचना, 10 वर्ष की कैद व आर्थिक दंड का प्रावधान), धारा 166 (पब्लिक सर्वेंट द्वारा कानून की उन्लघना करना, एक वर्ष की कैद व जुर्माना का प्रावधान), धारा 336 (दूसरों की जिंदगी की सुरक्षा को खतरे में डालना, एक वर्ष तक की कैद व जुर्माना), धारा 406 (अपने फायदे के लिए लोगों के विश्वास को ठेस पहुंचाना, तीन वर्ष तक की कैद व जुर्माने का प्रावधान) , धारा 409 (लोक सेवक द्वारा विश्वास का आपराधिक हनन, 10 वर्ष तक की कैद व जुर्माना), धारा 420 (छलकपट पूर्ण व्यवहार द्वारा बेईमानी से बहुमूल्य वस्तु देने के लिए प्रेरित करना ( 7 वर्ष का कठोर कारावास व जुर्माने का प्रावधान), धारा 471 (चालबाजी से तैयार फर्जी दस्तावेज या अभिलेख का असली की तरह प्रयोग करना, 10 साल का कारावास व आर्थिक दंड का प्रावधान) तथा प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13 (1)  के तहत आरोपी बनाया गया है। इनके अलावा सौ से अधिक प्राइवेट पार्टीज (कारपोरेट कंपनियों) को भी केस  में गवाह के तौर पर पेश होने के लिए समन दिए गए हैं। ज्यादातर कारपोरेट कंपनियां समन तामील होने के बाद कोर्ट में अपनी हाजिरी  लगवा चुकी हैं। ट्रांसपोर्ट विभाग के कर्मचारी भी अपनी हाजिरी लगवा चुके हैं। कोर्ट में पेश किए गए तथ्यों, दस्तावेजों व सबूतों की ट्रांसपोर्ट

यह है मुद्दा

कोर्ट में दाखिल शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परिवहन विभाग के अधिकारी व कर्मचारी पिछले तीन साल से लगातार जनता को अंधेरे में रख कर दोनों हाथों से लूटने में लगे हुए हैं और सरकारी खजाने को सीधा नुक्सान पहुंचा रहे हैं। आरोप यह है कि एक एक्टीवा से लेकर करोड़ों रूपये की लक्जरी गाडिय़ों और भारी भरकम वाहनों की खरीद फरोख्त में उपभोक्ताओं से वास्तविक कीमत के मुकाबले 65 फीसदी अधिक कीमत वसूली जा रही है और बेचारे उपभोक्ता अज्ञानता के कारण अपनी जेबें खाली करा रहे हैं।

लूट का यह पैसा वाहन निर्माता कंपनियों, उनके डीलर्स , कारपोरेट घरानों, लालची  नेताओं और भ्रष्ट अफसरों व कर्मचारियों की गिरह में जा रहा है। इसके अलावा ऐसे सबूत भी मिले हैं कि ये सब लोग माफिया की तरह सरकारी टैक्स की भी खुलेआम चोरी कर रहे हैं । वाहनों की बिक्री पर लगने वाले 10 फीसदी के रजिस्ट्रेशन टैक्स में भारी घपले के सबूत हाथ लगे हैं।
गौरतलब है कि इस तरह की घपलेबाजी देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी जारी है। केंद्र शासित सात राज्य सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और परिवहन मंत्री नीतिन गडक़री के अंतर्गत हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय, परिवहन मंत्रालय को इस घपले की शिबायते सबूतों के साथ कई दफा की गईं, लेकिन किसी ने भी इस बारे में लेशमात्र भी कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने इस अनदेखी को एक तरह से इन अधिकारियों की संलिप्ता के तौर पर देखा है और इसी लिए इन्हें कोर्ट में हाजिर होने का हुक्म देने का फैसला किया है

आरोप यह है कि एक एक्टीवा से लेकर करोड़ों रूपये की लक्जरी गाडिय़ों और भारी भरकम वाहनों की खरीद फरोख्त में उपभोक्ताओं से वास्तविक कीमत के मुकाबले 65 फीसदी अधिक कीमत वसूली जा रही है और बेचारे उपभोक्ता अज्ञानता के कारण अपनी जेबें खाली करा रहे हैं।
उपभोक्ताओं के साथ वाहन के टैम्परेरी रजिस्ट्रेशन के नाम पर भी खुली लूट चल रही है।
सरकारी टैक्स की भी खुलेआम चोरी कर रहे हैं । वाहनों की बिक्री पर लगने वाले 10 फीसदी के रजिस्ट्रेशन टैक्स में भारी घपले के सबूत हाथ लगे हैं।

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने लगाई थी कोर्ट के आदेश पर रोक

जब मुख्यमंत्री का यह आदेश राज्य के चीफ सेक्रेटरी की मार्फत तामील होने के लिए परिवहन विभाग के तत्कालीन सेक्रेटरी अशोक खेमका के पास पहुंचा तो उन्होंने इस पत्र पर कड़ा नोट लिख डाला कि मुख्यमंत्री का आदेश पालन करने के योग्य नहीं है, क्योंकि यह भारत के संविधान की भावना, मोटर वहीकल एक्ट के प्रावधानों तथा सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के पूरी तरह खिलाफ है। मुख्यमंत्री ने कारपोरेट कंपनियों के सीईओज से मुलाकात होने के बाद यह फैसला लि औरया है, जिससे साफ है कि फैसला जनहित में नहीं बल्कि कारपोरेट कंपनियों के हित में लिया गया है। खेमका का यह नोट मुख्यमंत्री को इतना नागवार गुजरा था कि उन्होंने खेमका को फौरन ही परिवहन विभाग से चलता कर एक मामूली विभाग में खुड्डे लाइन लगा दिया था।  मजेदार तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री का एक साल के लिए लिया गया उपरोक्त फैसला पिछले तीन साल से बदस्तूर चालू है और कारपोरेट कंपनियों के कर्ताधर्ता मुख्यमंत्री से पूरी तरह खुश हैं। मुख्यमंत्री भी इन कंपनियों को डिस्टर्ब करने के बिल्कुल मूड में नहीं है। कंपनियों की मनमानी बदस्तूर जारी है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश फाइलों की भीड़ में धूल खा रहे हैं।

याद रहे जैसे परमात्मा के दरबार में प्रत्येक कर्म का लेखा-जोखा होता है उसी तरह देश की जनता भी आपके कार्यों को देख रही है और न्यायपालिका आपको आपके किए की सज़ा ज़रूर देगा चाहे आप जितना मर्ज़ी समन की अनदेखी कर लें क्योंकि समय आने पर संविधान के अनुसार सज़ा ज़रूर मिलेगी।

साभार: Garima Times (online portal)

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