“सतयुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का सत्सुकृत नाम से प्राकाट्य”

वर्तमान में चल रही चतुर्युगी के प्रथम सत्ययुग में मैंने (परमेश्वर कबीर जी ने) एक सरोवर में कमल के फूल पर शिशु रूप धारण किया। एक ब्राह्मण दम्पति निःसन्तान था। वह विद्याधर नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी दीपिका के साथ अपनी ससुराल से आ रहा था। उनकी आधी आयु बीत चुकी थी। कोई संतान नहीं थी। दीपिका को अपने पिता के घर पर कुछ औरतों ने हमदर्दी जताते हुए कई बार कहा था कि संतान बिना स्त्री का कोई सम्मान नहीं करता। एक संतान तो होनी ही चाहिए। इन बातों को याद करके दीपिका रो रही थी तथा सुबकी लेकर अपने ईष्ट शिव जी से संतान की प्रार्थना कर रही थी। विचार कर रही थी कि वृद्धावस्था में हमारी ऊँगली पकड़ने वाला भी नहीं है। वह समय कैसे बीतेगा? इतने में एक सरोवर दिखाई दिया। प्यास लगी थी। वे सरोवर पर विश्राम हेतु रूके। वहाँ एक नवजात शिशु को कमल के फूल पर प्राप्त करके अति प्रसन्न हुए। उसे परमेश्वर शिव की कृपा से प्राप्त जान कर घर ले आए। एक अन्य ब्राह्मण से नाम रखवाया उसने मेरा नाम सत्सुकृत रखा। मेरी प्रेरणा से कुंवारी गायों ने दूध देना प्रारम्भ किया। उनके दूध से मेरी परवरिश की लीला हुई। गुरूकुल में शिक्षा की लीला की। ऋषि जी जो वेद मन्त्र भूल जाते तो मैं खड़ा होकर पूरा करता। ऋषि जी वेद मन्त्रों का गलत अर्थ करते मैं विरोध करता। इस कारण से मुझे गुरूकुल से निकाल दिया। पृथ्वी पर घूम कर मैंने बहुत से ऋषियों से ज्ञान चर्चा की परन्तु शास्त्रविरूद्ध ज्ञान पर आधारित होने के कारण किसी भी ऋषि-महर्षि ने ज्ञान सुनने की चेष्टा ही नहीं की। महर्षि मनु से भी मेरी वेद ज्ञान पर भी चर्चा हुई। महर्षि मनु ने ब्रह्मा जी से ही ज्ञान ग्रहण किया था। महर्षि मनु जी ने मुझे उल्टा ज्ञान देने वाला बताया तथा मेरा उपनाम वामदेव रख दिया। मैंने महर्षि मनु व अन्य ऋषियों से यहाँ तक कहा कि वह पूर्ण परमात्मा मैं ही हूँ। उन्होंने मेरा उपहास किया तथा कहा आप यहाँ हैं तो आपका सतलोक तो आपके बिना सुनसान पड़ा होगा। वहाँ सतलोक में जाने का क्या लाभ? वहाँ गये प्राणी तो अनाथ हैं। मैंने कहा मैं ऊपर भी विराजमान हूँ। तब मनु जी सहित सर्व ऋषियों ने ठहाका लगा कर कहा फिर तो आपका नाम वामदेव उचित है। वामदेव का अर्थ है कि दो स्थानों पर निवास करने वाला, भी है। वाम अक्षर दो का बोधक है। इस प्रकार उन ज्ञानहीन व्यक्तियों ने मेरे तत्त्वज्ञान को ग्रहण नहीं किया। (वामदेव का प्रमाण शिवपुराण पृष्ठ 606-607 कैलाश संहिता प्रथम अध्याय में है।)
बहुत से प्रयत्न करने पर कुछ पुण्यात्माओं ने मेरा उपदेश ग्रहण किया। मैंने स्वस्म वेद (कविगिरः=कविर्वाणी) की रचना की जिसकी काल द्वारा प्रेरित ज्ञानहीन ऋषियों ने बहुत निन्दा की तथा जनता से इसे न पढ़ने का आग्रह किया। सतयुग के प्राणी मुझे केवल एक अच्छा कवि ही मानते थे। इस कारण से सतयुग में बहुत ही कम जीवों ने मेरी शरण ग्रहण की। सतयुग में मानव की आयु एक लाख वर्ष से प्रारम्भ होती है तथा सतयुग के अन्त में दस हजार वर्ष रह जाती है। सत्ययुग में बहुत ही पुण्यकर्मी प्राणी जन्म लेते हैं। सतयुगमें स्त्री विधवा नहीं होती। पिता से पहले पुत्र की मृत्यु नहीं होती। आपसी भाई चारा बहुत अच्छा होता है। चोरी-जारी अन्य बुराईयाँ नाम मात्र में ही होती हैं। तथा शराब, मांस, तम्बाकू आदि का सेवन सत्ययुग के आदि में प्राणी नहीं करते। ब्राह्मण विद्याधर वाली आत्मा त्रेता युग में वेदविज्ञ ऋषि हुए तथा कलयुग में ऋषि रामानन्द हुए तथा दीपिका वाली आत्मा त्रेता में सूर्या हुई तथा कलयुग में कमाली हुई तथा सतयुग में बहुत ही कम प्राणियों ने मेरी शरण ली।
पूर्ण प्रभु कबीर जी (कविर्देव) सतयुग में सतसुकृत नाम से स्वयं प्रकट हुए थे। उस समय गरुड़ जी, श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी आदि को सतज्ञान समझाया था।

आदि अंत हमरै नाहीं, मध्य मिलावा मूला। ब्रह्मा को ज्ञान सुनाइया, धर पिण्डा अस्थूल।।
श्वेत भूमि को हम गए, जहाँ विश्वम्भर नाथ। हरियम् हीरा नाम देय, अष्ट कमल दल स्वांति।।
हम बैरागी ब्रह्म पद, सन्यासी महादेव। सोहं नाम दिया शंकर कूं, करे हमारी सेव।।

इस प्रकार सतयुग में परमेश्वर कविर्देव जी जो सतसुकृत नाम से आए थे उस समय के ऋषियों व साधकों को वास्तविक ज्ञान समझाया करते थे। परन्तु ऋषियों ने स्वीकार नहीं किया। सतसुकृत जी के स्थान पर परमेश्वर को ‘‘वामदेव‘‘ कहने लगे….क्रमशः